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बस है कोशिश उड़ूँ कुतरे पर ले

बह्र - 2122-1221-22

इतना उलझा है आदम बसर में।।
खुद से पूछे वो है किस सफर में ।।

क्या समझ पाएगे रात भर में।।
फर्क है इस नजर उस नजर में।।

ना बदल पाऊं बिलकुल न बदले।
पर है कोशिश उड़ूँ कुतरे पर में।।

अपनी मंजिल से है लापता जो ।
चीखता फिर रहा, रह-गुजर में।।

हर मुसाफिर की कोशिस यही बस।
सब सलामत रहे मेरे घर में।।

आमोद बिन्दौरी /मौलिक- अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 10, 2018 at 9:50pm

आ. भाई आमोद जी, अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on September 10, 2018 at 11:21am

जनाब आमोद बिंदौरी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

मतले का ऊला कुछ और कसावत चाहता है ।

Comment by babitagupta on September 8, 2018 at 10:36pm

बेहतरीन रचना ,आखिरी दो पंक्तियाँ बहुत सटीक,हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय आमोद सरजी.

कृपया ध्यान दे...

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