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122 122 122 122 

न जाने मुहब्बत में क्या चाहते हैं ।
जरा सी वफ़ा पर वो दिल मांगते हैं ।।

जिन्हें कुछ खबर ही नहीं दर्द क्या है ।
वही ज़ख़्म मेरा बहुत देखते हैं ।।

अगर वास्ता ही नहीं आपसे है ।

मेरा हाले दिल आप क्यूँ पूछते हैं ।।

असर चाहतों का दिखा फिर है उनका ।
अदाओं में चिलमन से जब झांकते हैं ।।

जो ठुकरा दिए थे मेरी बन्दगी को ।
मेरे घर का वो भी पता ढूढते हैं ।।

जुदाई में हमको ये तोहफ़ा मिला है ।
के हम रात भर याद में जागते हैं ।।

मिली मंजिलें हैं उन्हीं को यहां पर ।
समर्पण लिए जो डगर खोजते हैं ।।

उन्हें फ़िक्र होगी तरक्की हुई गर ।
जो गड्ढे मेरी राह में खोदते हैं ।।

मुहब्बत पे जिनको भरोसा बहुत है ।
सितम ढा के अक्सर वही रूठते हैं ।।

नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित


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Comment by Ravi Shukla on August 10, 2018 at 11:54pm

आदरणीय नवीन मणि जी गजल के  लिए बधाई स्वीकार करें आदरणीय समर साहब की इस्लाह से कवाफी का मुआमला स्पषट हो गया होगा 

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 7, 2018 at 9:44pm

बहुत बहुत धन्यवाद सर । मैंने अते काफ़िया बनाने का प्रयास किया था । यहां अलिफ़ साइलेंट होकर जुड़ा हुआ है । हलाकि यह काफ़िया विवादित माना जाता है पर कुछ लोग इस पर सहमति भी देते हैं । 

    आपके कमेंट से मेरा कन्फ्यूजन दूर हुआ हार्दिक आभार सर ।

Comment by Samar kabeer on August 7, 2018 at 9:37pm

ये मतला भी गलत है,आपका क़ाफ़िया 'ते' है तो हर्फ़-ए-रवी क्या है? मतला यूँ करें फिर आप समझ लेंगे कि क़वाफ़ी क्या होने चाहिए:-

'वहाँ हमने देखा जहाँ भी गये हैं

ख़ुदा के तो यारो हज़ारों पते हैं'

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 7, 2018 at 9:11pm

आ0 कबीर सर सादर नमन बिलकुल सहमत हूँ । जल्दबाजी में गलती हो गयी है । मतला चेंज करता हूँ ।

जहां भी गये हम वहां  देखते  हैं ।

खुदा के भी यारो हजारों पते हैं ।।

देखिये सर क्वाफी दुरुस्त हुआ या नहीं ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 7, 2018 at 7:35pm

आ0 कबीर सर सादर नमन बिलकुल सहमत हूँ । जल्दबाजी में गलती हो गयी है । मतला चेंज करता हूँ ।

जहां भी गये हम वहां  देखते  हैं ।

खुदा के भी यारो हजारों पते हैं ।।

देखिये सर क्वाफी दुरुस्त हुआ या नहीं ।

Comment by TEJ VEER SINGH on August 7, 2018 at 7:33pm

हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि जी।बेहतरीन गज़ल।

जो ठुकरा दिए थे मेरी बन्दगी को ।
मेरे घर का वो भी पता ढूढते हैं ।।

Comment by Samar kabeer on August 7, 2018 at 2:21pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,इस ग़ज़ल में क़वाफ़ी सहीह नहीं हैं,देखियेगा ।

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