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ग़ज़ल...यादों के सरमाये-बृजेश कुमार 'ब्रज'

बह्र-ए-मीर पर आधारित ग़ज़ल

कमबख्त कहाँ से आये इतनी रात गये
उनकी यादों के साये इतनी रात गये

आज उभर के आया है इक दर्द पुराना
बेलौस हवा सहलाये इतनी रात गये

कश्ती कागज की गहरे यादों के दरिया
अब नींद कहाँ से आये इतनी रात गये

गीली मिटटी की सौंधी सौंधी सी खुशबू
अंतस में आग लगाये इतनी रात गये

किस प्रियतम के लिए हुआ बैचैन पपीहा
जो घड़ी घड़ी चिल्लाये इतनी रात गये

दूर उफ़क़ से आती हैं ग़मगीन सदाएं
'ब्रज' मुझको कौन बुलाये इतनी रात गये
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 4, 2018 at 7:20pm

आभार संग नमन आदरणीय लक्ष्मण धामी जी...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 3, 2018 at 7:26pm

आ. भाई बृजेश जी ,सुंदर गजल हुयी है हार्दिक बधाई ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 3, 2018 at 4:22pm

तहेदिल से शुक्रिया ज़नाब राज़ नवादवी जी...

Comment by राज़ नवादवी on July 2, 2018 at 8:36pm

आदरणीय बृजेश जी, आदाब. ख़ूबसूरत ग़ज़ल कहने के लिए बधाई स्वीकार करें. मतला सुन्दर बन पडा है. सादर 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 2, 2018 at 8:32pm

आदरणीय आरिफ जी स्वागत संग आभार आपका...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 2, 2018 at 8:32pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय समर कबीर जी...आपके शब्दों से उत्साह बढ़ जाता है...

Comment by Mohammed Arif on July 2, 2018 at 2:14pm

आदरणीय बृजेश कुमार जी आदाब,

                  बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ दिली मुबारकबाद ।

Comment by Samar kabeer on July 2, 2018 at 11:24am

जनाब बृजेश कुमार "ब्रज," साहिब आदाब,बह्र-ए-मीर पर ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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