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दि 'बेस्ट' या 'वर्स्ट' (लघुकथा)

"स्कूल में दीदी की तरह मुझे भी मेरी मम्मी और टीचर ने सिखाया था कि कब क्या करना है और कब क्या नहीं? लेकिन मम्मी की तरह शायद दीदी भी न बच पायी!" मौक़ा पाते ही पीछे के छोटे से खपरैल वाले कमरे में लालटेन की रौशनी में अपनी आंसुओं को पीती सी हुई उसने बड़ी हिम्मत के साथ आगे लिखा -"मम्मी पर तो पूरे परिवार की ज़िम्मेदारियाँ हैं, सो वह साहब की सब सहती रही, पैसों की जुगाड़ करती रही! लेकिन जब मेरी दीदी ने साहब के 'बेड-टच' की शिक़ायत मम्मी से की, तो यही जवाब मिला था कि "किसी से कुछ मत कहना, अब तो वैसा भी आम हो चला है! अज़ीब से 'हैंड-शेक' से लेकर इशारों के 'बैड-टच' तक ! .... और फिर दीदी अपनी पीड़ा दबाकर रह गयीं थीं। एक दिन मैंने भी साहब को मम्मी को वैसा 'बैड-टच" करते देख लिया था, लेकिन मैंने किसी से तो क्या, अपनी मम्मी और दीदी को भी कुछ न बताया! मन ही मन कुछ ठान लिया था, बस!"


इतना लिखने के बाद उसने फिर से दीदी की वे दो चिट्ठियां पढ़ीं, जो घर पर कहीं से अचानक आज उसके हाथ लगीं थीं, दीदी की ख़ुदक़ुशी करने के बीस दिनों बाद! उसके आंसू अब थम नहीं रहे थे। दीदी को उसकी, छोटे दुधमुंहे भैया की और बापू के भविष्य की चिंता थी!


"लेकिन मुझे ख़ुशी है कि उस बहशी के 'वर्स्ट-टच' के पहले ही मैं टीचर जी के बताए अनुसार उसे चकमा देकर यूं भाग निकली।" धीमे से सिसकते हुए लालटेन की रौशनी कुछ और कम करते हुए उसने आगे लिखा - "... लेकिन मैं 'वैसी' चुप न रहूंगी! मैं आज ही यह चिट्ठी अपनी उन टीचर जी को दूंगी और ऐसी ही चिट्ठियां आगे ज़िम्मेदार अफ़सरों, मंत्रियों तक किसी तरह पहुंंचाउंगी, .. पर आत्महत्या का मौक़ा ही न आने दूंगी, .. हरग़िज़ नहीं सोचूंगी 'वैसा' कुछ!"


कुछ आहट सी सुनकर वह स्टूल के नीचे दुबक गई थी। दरअसल नई भोर होने वाली थी।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on Thursday

अपनी राय साझा करते हुए मेरी इस रचना के अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीय विजय निकोरे जी और आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज'  साहिब।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Thursday

बहुत ही सटीक और सार्थक विषय से ओतप्रोत लघुकथा..वाह बहुतखूब आदरणीय

Comment by vijay nikore on Tuesday

//लेकिन मैं 'वैसी' चुप न रहूंगी! मैं आज ही यह चिट्ठी अपनी उन टीचर जी को दूंगी और ऐसी ही चिट्ठियां आगे ज़िम्मेदार अफ़सरों, मंत्रियों तक किसी तरह पहुंंचाउंगी, .. पर आत्महत्या का मौक़ा ही न आने दूंगी, .. हरग़िज़ नहीं सोचूंगी 'वैसा' कुछ!"//.....

यह पंक्तियाँ बहुत ही ज़ोरदार हैं। आज के माहोल में लड़कियों को, बेटियों को, ऐसे ही निडर होना चाहिए, और होना पड़ेगा।

अच्छी लघु कथा के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on Tuesday

आदाब। मेरी इस रचना के मर्म को समझते हुए अनुमोदन और हौसला/ह़िम्मत अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब महेंद्र कुमार साहिब।

Comment by Mahendra Kumar on June 11, 2018 at 7:01pm

यौन हिंसा का प्रतिकार ही उसका वास्तविक इलाज है. इस संदेशपरक लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी. सादर.

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