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212 212 212 212

हो गईं इश्क में कैसी दुश्वारियां ।
हाथ आती गयीं सिर्फ बेचैनियां ।।1

क्यों हुई ही नहीं तुमसे नजदीकियां ।
हम समझने लगे थोड़ी बारीकियाँ ।।2

इस तरह मुझपे इल्जाम मत दीजिये ।
कब छुपीं आप से मेरी लाचारियां ।।3

उनकी तारीफ़ करती रहीं चाहतें ।
वो गिनाते रहे बस मेरी खामियां ।।4

दिल चुरा ले गई आपकी इक नजर ।
कर गए आप कैसे ये गुस्ताखियां ।5

दिल जलाने की साजिश से क्या फायदा ।
दे गया कोई जब आपको चूड़ियां ।।6

उन दरख्तों से मैं क्या शिकायत करूँ ।
जब लचकती रहीं बाग में टहनियां।।7

एक आई लहर सब उड़ा ले गयी ।
कुछ बचा ही नहीं प्यार के दरमियाँ ।।8

पार करने का जब हौसला ही न था ।
क्यों समंदर में उतरीं नईं कश्तियाँ ।।9

हिज्र के रास्ते पर चला था मगर ।
रुक गये यूँ कदम देखकर सिसकियाँ ।।10

हम घटाते रहे उम्र भर फासले ।
तुम बढाते गये बेसबब दूरियाँ ।।11

--- नवीन

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on May 10, 2018 at 8:06am

आ0 कबीर सर सादर नमन । जी सर अभी बदलता हूँ ।

Comment by vijay nikore on May 9, 2018 at 8:50pm

गज़ल अच्छी कही है। मुबारक ।

Comment by Samar kabeer on May 9, 2018 at 3:16pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

हुस्न-ए-मतला में 'नजदीकियां-और बारीकियां,दोनों मिसरों में "कियाँ",एक मिसरे में क़ाफ़िया बदलें ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on May 9, 2018 at 1:15pm

भाई राम शिरोमणि जी यह मेरी पाठशाला यहाँ मैं कबीर सर निर्देशन में ग़ज़ल की ए बी सी डी सीखता हूँ ।

Comment by ram shiromani pathak on May 9, 2018 at 8:29am

सुंदर अशआर हुए है भाई।।आपको यहाँ देखकर प्रसन्नता हुई।।जय जय

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