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(122 122 122 122)

करोगे कहां तक सबब की वज़ाहत
अंधेरों की कब तक करोगे इबादत

यक़ीं रख के सर को झुकाते रहे हो
दिखाते रहे हो ये कैसी शराफ़त

नहीं ठीक है जो तुम्हारी नज़र में
उसी की ही करते रहे हो वकालत

नई प्रेम नदियां बहा दो जहां में
यहां पर दिखाओ ज़रा सी सख़ावत

भले ख्वाब हों पर हक़ीक़त बनेंगे
मिटेगी यहां नफरतों की रिवायत

.

- नंद कुमार सनमुखानी

- मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 6, 2018 at 2:43pm

वाह वाह खूब ग़ज़ल कही आदरणीय..सादर

Comment by Nand Kumar Sanmukhani on May 6, 2018 at 11:18am

बहुत-बहुत शुक्रिया  आ. 'मुसाफ़िर' साहब..

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 6, 2018 at 11:13am

आ. नन्दकुमार जी, सुंदर गजल हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by Nand Kumar Sanmukhani on May 5, 2018 at 6:07pm
जी, श्रीमान...
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2018 at 5:11pm

आ. नन्द कुमार जी,
मेरा  कतई आग्रह नहीं है कि आप  वो शेर शामिल करें...
मैं सिर्फ़ यह इंगित कर रहा हूँ  कि बात कहने के तरीके और भी हैं... और उन्हीं शब्दों के आसपास हैं..
बस कवि से हटकर पाठक बनकर सोचने की आवश्यकता है ..
सादर 

Comment by Nand Kumar Sanmukhani on May 5, 2018 at 5:03pm

आ. Samar Kabeer साहब, मुझे भी 'ही' की जगह 'तो' का इस्तेमाल ज़्यादा अपीलिंग लग रहा है, इस लिए मैं इस शइर में ये सुधार कर लेता हूं और  शइर को बेहतर बनाने में मेरी मदद करने के लिए आपका शुक्रिया अदा करता हूं।

Comment by Nand Kumar Sanmukhani on May 5, 2018 at 4:51pm
माननीय Nilesh Shevgaonkar जी,
बधाई के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ।
हर आदमी का अपनी बात कहने का अंदाज़ अपना-अपना होता है। वो अंदाज़ बहुत अच्छा है, या कम अच्छा है अथवा बिल्कुल भी अच्छा नहीं है, यह एक अलग बात है। सब लोग एक जैसा अच्छा या बुरा तो नहीं लिख सकते ना ! ग़ालिब साहब का इस पर एक बहुत अच्छा शइर है, जो यक़ीनन आपने भी सुना होगा:

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि ग़ालिब का है "अंदाज़े बयां और"
आपके द्वारा सुझाया गया शइर वाक़ई बहुत बढ़िया है, लेकिन वह आपकी रचना है। काश मैं भी किसी दिये गये विषय पर इतना अच्छा शइर इतनी आसानी से लिख पाता। लेकिन धीरे-धीरे मेरे इज़हार में भी स्पष्टता और रवानी आती जाएगी, ऐसी उम्मीद करता हूं।
बहरहाल, आप जिस अपनेपन से मेरी अदना कोशिशों की कमियों-ख़ामियों की तरफ इशारा करते हैं, उसका मैं क़ायल हूं और इसके लिए आपका शुक्रिया अदा करता हूं।
Regards....
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2018 at 4:24pm

आ. नन्द कुमार जी 
अच्छी ग़ज़ल हुई है ,,बधाई ..
शेरोन में लोच की थोड़ी कमी लग रही है ..
उदाहरण  के लिए 
.
नहीं ठीक है जो तुम्हारी नज़र में
उसी की ही करते रहे हो वकालत.... इसे यूँ कहा जा सकता है ..
.
ग़लत है तुम्हारी नज़र में भी लेकिन 
किये जा रहे हो उसी की वकालत 
.
सादर 

Comment by Samar kabeer on May 5, 2018 at 3:47pm

भर्ती के शब्द से मुराद है, उसकी जगह कोई मज़बूत शब्द जैसे :-

'उसी की तो करते रहे हो वकालत'

'तो' शब्द यहाँ 'ही' की बनिस्बत मुनासिब है, यही मैं अर्ज़ करना चाहता था ।

Comment by Nand Kumar Sanmukhani on May 5, 2018 at 12:48pm
माननीय Samar Kabeer साहब,
ग़ज़ल पसंद करने के लिए आपका तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूं।
आपकी राय में जो 'ही' भर्ती का लगता है उसे हटा देने पर , वज़न की कमी के अलावा,
मेरे विचार से बात का वो पैनापन ख़त्म हो जाता है, जो वहां मेरे विचार से होना चाहिए , तनिक नज़र डालें :
नहीं ठीक है जो तुम्हारी नज़र में
उसी की करते रहे हो वकालत
ये शइर वैकल्पिक रूप में शायद मैं यूं लिखता;
"नहीं ठीक है जो तुम्हारी नज़र में
उसी की तो करते रहे हो वकालत"
मिसरे में हे "तो" या "ही" हटा देने से, वज़न की अन्यथा पूर्ति करने की हालत में भी, मुझे लगता है यह किसी सपाट बयान जैसा लगेगा...
सादर...

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