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ढाक के तीन पात (लघुकथा)

चुनाव नतीज़ों के साथ ही एक तरफ़ 'जीत' के जश्न हैं तो दूसरी तरफ़ 'हार' में छिपी प्रोत्साहक 'जीत' के जश्न हैं! जीते हुओं के चेहरों पर ' वैसी' मुस्काने नहीं हैं, जो असली में होती हैं! हारकर भी 'जीत' महसूस करने वालों के चेहरों पर कुछ अज़ीब सी मुस्कानें हैं! आम चुनावों में  विजेता दलों के संगठन और उसे अच्छी टक्कर देने वाला, नेस्तनाबूद माना जाने वाला इकलौता विरोधी संगठन, दोनों के ख़ास नेताओं के समक्ष ढेरों प्रश्न हैं!लोकतांत्रिक देश का आम आदमी भौंचक्का सा मीडिया पर अपनी इंद्रियों को केंद्रित किए हुए है! 
"सच्चाई तो यह है यार कि न तो ढेरों घोषणाओं और योजनाओं के नाम पर वे मतदाताओं को रिझाने में  पूरी तरह तरह क़ामयाब हुए और न ही विकास, धर्म और जातिवाद के नाम पर! वरना अपेक्षित सीटों पर  उन्हें विजय ज़रूर हासिल होती!" टेलीविजन देखते हुए एक आदमी ने कहा।
"दरअसल ग़रीबों, पिछड़ों और किसानों को अपनी ओर खींचने की तमाम कोशिशों के बावजूद विरोधी दलों का संगठन बहुमत की मंज़िल के नज़दीक़ आते-आते  ही ठहर गया!" दूसरे साथी ने बड़े निराश स्वर में कहा।
"हमेशा की तरह दोनों संगठनों का विचार-मंथन जारी है!" पहला आदमी कुछ व्यंगात्मक लहज़े में  बोला।
 "यही तो आम जनता पर भारी है, भाई!" - दूसरे ने कहा।
"ये कोई वैसा विचार-मंथन नहीं है, ये तो बस पिछले भाषणों में कहे हल्के शब्दों और कटाक्षों पर ही एक-दूसरे पर पुनः हल्के शब्दों से कटाक्ष कर रहे हैं!" पहले आदमी ने हंसते हुए कहा।
"बंद करो यार, ये टी.वी!  बच्चों या औरतों जैसे इनके ज़िद्दी 'वाकयुद्ध' हर आम-ओ-ख़ास हैरान-परेशान है!" दूसरे साथी ने रिमोट मांगने के इशारे के साथ कहा।
"दोनों संगठनों के बड़बोले नेता और कार्यकर्ता कठपुतलियों से नाच रहे हैं, नारे लगा रहे हैं! लोगों को बरगला रहे हैं, बस!" पहला आदमी बड़बड़ाने लगा- "अपने ही किये का बस 'तमाशा' बनते देख रहे हैं, और क्या?"
"वोट-बैंक बरकरार रखने के प्रश्न हैं! किसी के लिए 'विकास' और किसी के लिए 'शोषण' ही वोट-बैंक के आधार है!" टेलीविजन बंद करने के बाद दोनों में बहस सी छिड़ गई।
"मतदाताओं की बेवक़ूफियों के नज़ारे हैं सब, भाई! विकास क्यों हारता है? धर्म-आधारित गतिविधियां क्यों जीतती हैं? इस सदी का भारतीय मतदाता जालों में फंसता क्यों है?" पहले आदमी ने एक साथ सवाल किये।
"ये सवालात हैं  या आम जनता और तथाकथित बुद्धिजीवियों के विवाद के आधार? या सब कुछ निराधार है? ढाक के तीन पात हैं या ढोल के भीतर पोल या किसी की ढाई दिन की बादशाहत, बस!" - दूसरे साथी की कही सच्चाई पर पहला भी स्तब्ध रह गया! 
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 11, 2018 at 7:48am

आ. शेख़ शहजाद उस्मानी साहब,
एक और उम्दा लघुकथा के लिए बहुत बहुत  बधाई ..
कथानक से सहमत होने के बावजूद भी मैं   एक संवाद से असहमत हूँ..//"मतदाताओं की बेवक़ूफियों के नज़ारे हैं सब, भाई//
लोकतंत्र में मतदाता को बेवकूफ़  कहने का चलन ठीक नहीं है.. मतदाता बेवकूफ नहीं होता, हो ही नहीं सकता ...बरगलाया हुआ हो सकता है, भावुक हो सकता  है ...
यदि संभव हो तो देखिएगा... कोई   आग्रह नहीं है 
सादर 


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