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तुम्हारी कसम.... 

हिज़्र की रातों में
तन्हा बरसातों में
खामोश बातों में
नशीली मुलाकातों में
तुम्हारी कसम
सिर्फ़
तुम ही तुम हो

चांदनी के शबाब में
पलकों के ख्वाब में
प्यालों की शराब में
अर्श के माहताब में
तुम्हारी कसम
सिर्फ़
तुम ही तुम हो

ख्यालों की बाहों में
बेकरार निगाहों में
गुलों की अदाओं में
आफ़ताबी शुआओं में
तुम्हारी कसम
सिर्फ़
तुम ही तुम हो

साँसों के ऐतबार में
आती हुई बहार में
मिलन के करार में
वस्ल के इंतज़ार में
तुम्हारी कसम
सिर्फ़
तुम ही तुम हो

(शुआओं= किरणें )

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on February 18, 2018 at 5:11pm

आदरणीया रक्षिता जी आदाब,

                      आदरणीय सुशील सरना जी की रचना पर मेरी प्रतिक्रिया पर अपनी उत्साहवर्धक टिप्पणी देने का बहुत-बहुत शुक्रिया । यह मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य है ।

Comment by रक्षिता सिंह on February 18, 2018 at 1:23pm

आदरणीय आरिफ जी, 

सुशील जी रचना पर आपके द्वारा दी गयी बहुत ही लाजबाब  प्रतिक्रिया....बहुत खूब।

Comment by रक्षिता सिंह on February 18, 2018 at 1:02pm

आदरणीय सुशील जी नमस्कार।

खूबसूरत अंदाज में लिखीं बेहतरीन पंक्तियाँ... पढ़कर मजा आ गया। हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

Comment by Mohammed Arif on February 16, 2018 at 11:34pm

आपकी क़सम बहुत बेहतरीन है
ताज़ा तरीन है
मेहज़बीन है
ख़्याल महीन है
पढ़ रहे नाज़रीन है
आपकी क़सम
लाजवाब है
खुली किताब है
क्या ख़ूब शबाब है
बहुत लिखते जनाब है
आपकी क़सम
पढ़ने की रहती हसरत है
चलती लफ्ज़ों की शरारत है
कुछ-कुछ देती हिदायत है
लेकिन मेरी होती क़यामत है
कुछ- कुछ रहती शिकायत है
सच है रहती लियाकत है
आपकी ये सखावत है
पढ़ना मेरी आदत है
हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय सुशील सरना जी ।

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