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खामोश आखें

होली आयी और चली गयी,
पिछले साल से भली गयी,
पर किसी ने देखा!
किसका क्या जला?
मैंने देखा,
’उसकी डूबती खामोश आॅंखें’
और भीगी पलकों को,
और वह खड़ा,
एकटक देख रहा था,
’होली को जलते’
जैसे उसे मालूम न हो,
अपनी ‘आॅंखों ’ के कारनामे

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Manoj kumar shrivastava on November 22, 2017 at 8:01am

उत्साह वर्धन हेतु आपका कोटिशः आभार आदरणीय शेख अहमद जी

Comment by Manoj kumar shrivastava on November 21, 2017 at 7:04pm
आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी कोटिशः धन्यवाद, अप्रकाशित रचना पहले से थी, इसीलिए प्रेषित कर दिया।
Comment by Manoj kumar shrivastava on November 21, 2017 at 7:01pm
आदरणीय समर कबीर जी, सादर धन्यवाद स्वीकार करियेगा। आपका स्नेह बना रहे
Comment by Samar kabeer on November 21, 2017 at 2:49pm
जनाब मनोज कुमार श्रीवास्तव जी आदाब,अच्छी कविता है, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
'एक टक' को "एक टुक" कर लें ।
Comment by Mohammed Arif on November 21, 2017 at 12:31pm
आदरणीय मनोज कुमार जी आदाब,
अच्छी अभिव्यक्ति मगर सामयिक कविता नहीं है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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