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ग़ज़ल- अभी तक शख्स वो जिन्दा है साहब

मफाईलुन मफाईलुन फऊलुन
1222 1222 122


अभी तक शख्स वो जिन्दा है साहब।
निडर होकर जो सच कहता है साहब।

सभी हैं अपनी अपनी जिद पे कायम,
किसी की कौन अब सुनता है साहब

झगड़ने का कोई मुद्दा नहीं है,
यहाँ बेबात का झगड़ा है साहब।

बचाने को हमें ठिठुरन से सूरज,
बहुत दिन बाद फिर निकला है साहब।

ग़रीबी मुल्क से जायेगी अब तो,
सभी अखबार में चर्चा है साहब।

बुजुर्गों से बहुत आगे हैं बच्चे,
जमाना कुछ न कुछ बदला है साहब।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on November 21, 2017 at 2:43pm
जनाब राम अवध जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by Mohammed Arif on November 21, 2017 at 12:03pm
अभी तक शख्स वो जिन्दा है साहब।
निडर होकर जो सच कहता है साहब। बहुत ख़ूब! बहुत ख़ूब!! सच कहने वाले बिरले ही रह गए हैं जनाब ।
उम्दा ग़ज़ल के लिए दिली मुबारकबाद आदरणीय अवध बिहारी जी । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।
Comment by SALIM RAZA REWA on November 21, 2017 at 9:38am
वाह वाह.. हर शेर ख़ूबसूरत..
जनाब राम अवध साहिब ,सुन्दर ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं
Comment by नाथ सोनांचली on November 20, 2017 at 9:42pm
आद0 रामअवध विश्वकर्मा जी सादर अभिवादन। बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही आपने।

सभी हैं अपनी अपनी जिद पे कायम,
किसी की कौन अब सुनता है साहब
यह शैर बेहद पसंद आया। बहुत बहुत बधाई इस ग़ज़ल पर। सादर
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on November 20, 2017 at 9:11pm
जनाब राम अवध साहिब ,सुन्दर ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं

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