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गीत-क्रंदन कर उठे हैं भावना के द्वार पर-बृजेश कुमार 'ब्रज'

सभी पंक्तियों का मात्रा भार
2122 2122   2122 212 के क्रम में

गीत क्रंदन कर उठे हैं
भावना के द्वार पर

वेदना में याचना के
शब्द गीले हो गए
यातना के काफिलों से
पथ सजीले हो गए
आँसुओं की बेबसी में
दर्द की मनुहार पर
गीत क्रंदन कर उठे हैं
भावना के द्वार पर

आदमी में आदमी सा
क्या बचा है सोचिये?
पीर क्या है मुफलिसों की?
ये कभी तो पूछिये
हो रही फाकाकशी हर
तीज पर त्यौहार पर
गीत क्रंदन कर उठे हैं
भावना के द्वार पर

दीप जलते हैं कहीं पर
दिल कहीं जलते रहे
पतझरों की गोद में भी
फूल थे पलते रहे
अब कली सहमी हुई है
अश्क़ से शृंगार कर
गीत क्रंदन कर उठे हैं
भावना के द्वार पर
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 19, 2017 at 11:05pm
आदरणीय आरिफ जी आपका हार्दिक अभिनन्दन वंदन..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 19, 2017 at 11:04pm
आदरणीय अजय तिवारी जी गीत आपको पसंद आया उसके लिए आपका आभार..आपको भी दीपोत्सव की शुभकामनाएं..
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 19, 2017 at 11:02pm
आदरणीय समर सर रचना पटल पे आपकी उपस्थिति से अति प्रसन्नता का अनुभव हुआ..आपको भी परिवार सहित दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं...सादर
Comment by Mohammed Arif on October 19, 2017 at 10:42pm
आदरणीय बृजेश कुमार जी आदाब, बड़ी ही मार्मिक गीत की प्रस्तुति हुई । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Ajay Tiwari on October 19, 2017 at 7:06pm

आदरणीय बृजेश जी,
दीपोत्सव पर इस सुन्दर गीत प्रस्तुति के बधाईयाँ और दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये.
सादर

Comment by Samar kabeer on October 19, 2017 at 5:47pm
जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज'जी आदाब,बहुत सुंदर और मार्मिक गीत लिखा आपने ,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
दूसरे बन्द की पांचवीं पंक्ति में 'फांकाकशी' को "फ़ाक़ाकशी" कर लें।

आपको दीपावली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं ।

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