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शाम-ए-रंगीं  गुलबदन गुलफा़म है : सलीम रज़ा रीवा ग़ज़ल

2122 2122 212
..
शाम-ए-रंगीं  गुलबदन गुलफा़म है
मिल गए तुम जाम का क्या काम है
.. 
ये वज़ीफा़ मेरा सुब्ह-ओ-शाम है
मेरे लब पे सिर्फ तेरा नाम है
..
तू मिला मुझको सभी कुछ मिल गया
ये मुक़द्दर का बड़ा इनआम है

तुम हो सांसों में तुम्ही धड़कन में हो
ज़िन्दगी मेरी  तुम्हारे  नाम  है
..
हम किसी से दुश्मनी करते नहीं
दोस्ती तो प्यार  का  पैग़ाम है 
..
मेरा घर खुशिओं से है फूला फला 
मेरे रब का ये  बड़ा  इनआम है
..
दोस्ती उससे  मुनासिब  है  नहीं 
शह्र की गलिओं में जो बदनाम है
..
आ गए हैं प्यार के हम शह्र में
अब  यहाँ आराम ही आराम है
..
पा के सुर्खी़ आपके रुख़सार की
ख़ूबसूरत आज कितनी शाम है
..
लोग कहते हैं बुरा कहते रहें
साफ़ गोई में''रज़ा''बदनाम है
..
मौलिक व अप्रकाशित
सलीम रज़ा रीवा

Views: 975

Comment

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Comment by राज़ नवादवी on October 9, 2017 at 7:33pm

जनाब सलीम रज़ा साहब, सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by SALIM RAZA REWA on October 9, 2017 at 6:26pm
जनाब अफरोज साहब,
आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया,
Comment by Afroz 'sahr' on October 9, 2017 at 4:25pm
जनाब सलीम साहब अच्छी ग़ज़ल है बहुत मुबारकबाद आपको।

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