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रानी (लघुकथा )जानकी बिष्ट वाही

"बेचारी ?"
सामने वाली झुग्गी में इस नई ब्याही को।पति रोज काम पर जाते बाहर से ताला ठोक जाता है जैसे उसकी दिल की रानी को कोई चोर न ले जाय पीछे से।
छुटकी, बड़की को देख फिस्स से हँस दी।
" उसकी नज़र से देखा जाय तो ये मेहरारू ही उसका धन है।गज़ब की सुंदर जो है ।"
बड़की ने हँसी में साथ दिया।

वे दोनों रोज उसकी खूबसूरत पनीली बड़ी-बड़ी आँखें छुपकर देखने का मोह नहीं छोड़ पाती हैं ।जब से वह आई है उनका नीरस जीवन सरस हो उठा है। वर्ना सारा दिन यूहीं निकल जाता है जब से पढ़ाई छुड़वाई बापू ने।

" हाय ! उसके पास कितने चमकदार कपड़े और जेवर हैं।देख-देख मन ललचता है। दीदी !"

" तो अम्मा और बापू से कहकर ब्याह रचवा ले अपना ,सब मिल जायेगा तुझे।"
बड़की ने चुहल की।
" कह तो दें दीदी ! पर तू जो बैठी है मेरे आगे ?अभी कहाँ अपन का नम्बर ?"

छुटकी ने चुटकी लेते हुए एक गहरी साँस भरने का नाटक किया।

" छुटकी ! एक बात बहुत बुरी लगती है, उसकी सुंदर आँखों में कितनी उदासी भरी रहती हैं वे कभी नहीं हँसती है।जाने किन ख्यालों में खोई रहती है। पता है ? अक्सर मुझे उन आँखों का दर्द अपना सा लगता है।वे आँखें मुझे बचपन में ले जाती हैं।जब माँ-बापू काम पर जाने से पहले हमें घर में बन्द कर जाते थे और वह उनके लौटने तक हम दोनों उदास आँखों से खिड़की के बाहर ताकती रहती थीं। एक दिन मैंने पूछा -
" माँ ! तुम क्यों हमें ताले में बन्द कर जाती हो? "
तो माँ बोली-" तू दोनों की सुरक्छा के लिए रानी बिटिया।"

" लगता है दीदी ! इस नवेली का पति भी येई बोलता होगा कि रानी ! तेरी सुरक्छा के वास्ते ताला मार के जाता हूँ।"

" मालूम नहीं रे ! ये मरद जाति अगर कुठरिया में बन्द कर रानी बनाये तो मुझे नहीं करना ऐसा ब्याह।पता चले इस नवेली की तरह ही सीलन भरे कमरे में बन्द कर जाए ? रानी -रानी बोल के ? काहे की रानी ?

मौलिक एवम् अप्रकाशित
जानकी बिष्ट वाही
29/9/17
नॉएडा-उत्तर प्रदेश

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Comment by Mahendra Kumar on October 6, 2017 at 9:20pm

ग़ज़ब की लघुकथा है आ. जानकी वाही जी. शानदार व्यंग्य. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. 

"पर तू जो बैठी है मेरे आगे ?अभी कहाँ अपन का नम्बर ?" क्या यहाँ प्रश्नवाचक चिह्न होना चाहिए? देख लीजिएगा.

सादर.

 

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on October 1, 2017 at 12:35pm

आदरणीया जानकी जी, बहुत सुंदर रचना , सुरक्षा के नाम पर मिली कैद का गम आंखें बयां कर रही है।  सादर

Comment by Rahila on October 1, 2017 at 6:21am
सोने के पिंजड़े में भी...,कैद तो कैद है।यहाँ तो पिजड़ा भी कालकोठरी जैसा।सच आज़ादी का स्वाद तो सबसे अनोखा होता है।बहुत बढ़िया रचना प्रिय दी!सादर
Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 30, 2017 at 10:13pm
आदरणीया जानकी जी बढ़िया रचना है बिना आजाद के किसी भी ऑख का कोई अर्थ नहीं है बच्चियों के मन में उठते बिचारों को शानदार तरीके से रोचक बनाते हुए लिखी इस रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर

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