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1222 1222 1222 1222

हमारे ग़म का उसको क्या कभी अंदाज होता है।
हमारी राह में कांटे जो वो हरबार बोता है।

कभी रूठे अगर जो हम तो ये भी याद रखना तू,
न फिर पायेगा हमको तू अगर इस बार खोता है।

बता इस ग़म का तुझपर क्यों नहीं कोई असर होता,
तू हर दम मुस्कुराता है हमारा दिल जो रोता है।

झमेले ज़िन्दगी के मुश्किलों से झेलते हैं हम,
अकेले जूझते हैं हम उधर उधर वो खूब सोता है।

अजब अपनी कहानी है रहे हैं हम निथरते ही,
बरसती आँख का सावन बहुत 'मन' को भिगोता है।

मंजूषा मन
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by मंजूषा 'मन' on August 28, 2017 at 3:30pm
बहुत बहुत शुक्रिया महेंद्र जी... आपकी इस्लाह पर विचार कर ग़ज़ल को बेहतर बनाने का प्रयास करेंगे
Comment by मंजूषा 'मन' on August 28, 2017 at 3:28pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय नरेन्द्र जी
Comment by मंजूषा 'मन' on August 28, 2017 at 1:42pm
बहुत बहुत शूक्रिया आदरणीय गिरिराज जी
Comment by मंजूषा 'मन' on August 28, 2017 at 1:41pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सुरेन्द्र नाथ जी
Comment by Mahendra Kumar on August 26, 2017 at 8:38pm

आ. मंजूषा जी बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. मेरी तरफ़ से हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. मेरे हिसाब से चौथे शेर के सानी मिसरे और बेहतर करने की आवश्यकता है. सादर.

Comment by narendrasinh chauhan on August 24, 2017 at 6:17pm

खूबसूरत गज़ल के लिये हार्दिक बधाइयाँ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 24, 2017 at 9:10am

आदरणीया मंजूषा जी , खूबसूरत गज़ल के लिये हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on August 24, 2017 at 5:51am
आद0 मंजूषा जी सादर अभिवादन, बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दाद के साथ मुबारकबाद कबूल फरमायें
Comment by मंजूषा 'मन' on August 23, 2017 at 9:35pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ0 रवि जी...
Comment by मंजूषा 'मन' on August 23, 2017 at 9:33pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ0 मोहित जी

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