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कुछ तुम बोलो कुछ हम बोलें

बहर  फ़ैलुनx ४

कुछ तुम बोलो कुछ हम बोलें

सारा  मैल  ह्रदय  का धो लें 

 

सुख की धूप खिल रही बाहर,

अन्दर की खिड़की तो खोलें.

 

उगा लिए हैं बहुत कैक्टस,

बीज फूल के भी कुछ बो लें

 

सूख न जाए आँख का पानी,

किसी और के गम में रो लें

 

आँखों में कुछ ख्वाब सजाकर,

कभी चैन से थोड़ा सो लें

 

आसमान में उड़ना है तो,

थोड़े अपने पर भी खोलें

 

छुपा हुआ है जाने क्या क्या,

आओ अपना ह्रदय टटोलें

 

“मौलिक एवं अप्रकाशित”

 

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 12, 2017 at 12:40pm

ह्रदय से आभार आदरणीय Mohammed Arif  जी बहुत बहुत शुक्रिया आपकी हौसला अफजाई का 

Comment by Mohammed Arif on June 10, 2017 at 9:58pm
आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी आदाब, बहुत ही बेहतरीन, लाजवाब छोटी बह्र की ग़ज़ल । बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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