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ग़ज़ल नूर की- किसे गुरेज़ जो दो-चार झूठ बोले है,

१२१२/११२२/१२१२/२२ (११२)
.
किसे गुरेज़ जो दो-चार झूठ बोले है,
मगर वो शख्स लगातार झूठ बोले है.
.
चली भी आ कि तुझे पार मैं लगा दूँगी, 
हमारी नाव से मँझधार झूठ बोले है.
.
सवाल-ए-वस्ल पे करना यूँ हर दफ़ा इन्कार 
ज़रूर मुझ से मेरा यार झूठ बोले है.
.
कहानी ख़ूब लिखी है ख़ुदा ने दुनिया की,
कि इस में जो भी है किरदार, झूठ बोले है. 
.
पटकना रूह का ज़िन्दान-ए-जिस्म में माथा,
बिख़रना तय है प् दीवार झूठ बोले है.   
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 1196

Comment

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Comment by नाथ सोनांचली on May 22, 2017 at 1:39pm
आद0भाई नीलेश जी सादर अभिवादन, एक और जीवंत कसावट से भरी उम्दा ग़ज़ल कही आपने,दाद के साथ मुबारक बाद क़बूलें, सादर
Comment by Gurpreet Singh jammu on May 22, 2017 at 10:13am
आदरणीय नीलेश जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया ..इतनी अच्छी तरह समझाने के लिए ..
क्या"प्" को हर जगह "पर" के लघु रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है या किसी खास सूरत में ही...क्रुप्या ये भी बताइएगा सर जी
Comment by Manan Kumar singh on May 22, 2017 at 9:34am
जी सही है।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 22, 2017 at 8:36am

शुक्रिया आ. मनन जी,

शाइरी इशारों में होती है,, चाँद तारे तोड़ लाने में भी असंगतता है लेकिन तोड़े जाते हैं..
सादर

Comment by Manan Kumar singh on May 22, 2017 at 8:18am

एक अच्छी गजल के लिए बधाइयाँ आदरणीय। हाँ, दूसरे शेर में     '......... पार मैं लगा दूँगी       ....... मझधार झूठ बोले हैं ।' की संगतता असहज प्रतीत होती है शायद । देखिएगा, सादर।  

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 21, 2017 at 10:20pm

शुक्रिया आ. गुरप्रीत जी...
गुरेज़ से आशय है   नफ़रत या घृणा या अस्वीकार का भाव ... उसी सन्दर्भ में शेर हुआ है कि...   एक दो झूठ तो सब बोलते हैं, वो अस्वीकार्य या घृणा योग्य नहीं    है ..
.
ज़िन्दान-ए-जिस्म... यानी जिस्म की क़ैद (ज़िन्दान -क़ैद) ....प् ..पर के लघु रूप में इस्तेमाल होते आया है ...
रूह  जिस्म की क़ैद में लगातार सर फोड़ रही है ...
शरीर की दीवार ढहना तय है लेकिन शरीर (दीवार).. फिटनेस, मेक-अप के बनाने झूठ बोलता है ..
सादर 

Comment by Gurpreet Singh jammu on May 21, 2017 at 9:31pm
नीलेश सर जी यह ग़ज़ल भी आपकी हर ग़ज़ल की तरह बहुत पसंद आई है. आपकी ग़ज़लों का अलग ही अंदाज़ है..एक नवीनता सी है.जो मुझे बहुत पसंद आती है
आखरी शैर मैं समझ नहीं पाया सर जी
"ज़िन्दान-ए-जिस्म" इस शब्द का अर्थ नहीं मालूम और इसमें एक शब्द "प्"है इसके बारे में भी जानना चाहूंगा सर जी
मतला बहुत ही खूबसूरत है सर जी ..लेकिन इस में गुरेज शब्द के इस्तेमाल के बारे में कुछ असमंजस में हूँ. गुरेज को आपने शायद आपत्ति के भाव में लिया है..और मुझे लगता है की इसका अर्थ कुछ और है जैसे इस वाक्य देखिए "भविष्य में ऐसी हरकतों से गुरेज किया जाए"
सर जी छात्र होने के नाते ये ज़रूरी है कि जो बानीलेश सर जी यह ग़ज़ल भी आपकी हर ग़ज़ल की तरह बहुत पसंद आई है. आपकी ग़ज़लों का अलग ही अंदाज़ है..एक नवीनता सी है.जो मुझे बहुत पसंद आती है
आखरी शैर मैं समझ नहीं पाया सर जी
"ज़िन्दान-ए-जिस्म" इस शब्द का अर्थ नहीं मालूम और इसमें एक शब्द "प्"है इसके बारे में भी जानना चाहूंगा सर जी
मतला बहुत ही खूबसूरत है सर जी ..लेकिन इस में गुरेज शब्द के इस्तेमाल के बारे में कुछ असमंजस में हूँ. गुरेज को आपने शायद आपत्ति के भाव में लिया है..और मुझे लगता है की इसका अर्थ कुछ और है जैसे इस वाक्य देखिए "भविष्य में ऐसी हरकतों से गुरेज किया जाए"
सर जी एक छात्र होने के नाते ये ज़रूरी है कि जो सवाल दिमाग में आए उसे क्लियर कर लिया जाए लेकिन ये डर भी बना रहता है कि कहीँ ऊट-पटांग और मूर्खतापूर्ण सवालों से शिक्षक बुरा ही न मान जाए
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 21, 2017 at 7:01pm

शुक्रिया आ तस्दीक़ अहमद साहब ..
शतुर्गुरबा क्यूँ है ? आप यदि मिसरेइक से पढेंगे तो आप को स्पष्ट होगा कि संवाद की सूरत है ..
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 21, 2017 at 6:58pm

शुक्रिया आ. राम अवध जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 21, 2017 at 6:57pm

शुक्रिया आ. गिरिराज जी 

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