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मेरे प्यारे-प्यारे वैज्ञानिकों

सीलन भरी छत पर बैठकर
चाँद की ख़ूबसूरती को निहारने वाले
मेरे प्यारे-प्यारे वैज्ञानिकों
यदि संभव हो
तो अगली बार
भूख़, ग़रीबी, शोषण
और अत्याचार के साथ
इस नफ़रत भरी
विषैली बेल को भी
अपने उपग्रहों में लपेट कर
इस पृथ्वी से दूर
बहुत दूर
सुदूर अन्तरिक्ष में
छोड़ देना तुम
जहाँ से फिर कभी लौटना
संभव न हो
और हाँ
अगर तुम्हारे यान में
थोड़ी सी जगह और बचे
तो बिठा लेना मुझे भी
और फेंक देना रास्ते में
जहाँ कहीं भी तुम्हारा दिल करे!

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Mahendra Kumar on April 8, 2017 at 9:42pm
आपका हार्दिक आभार आदरणीया कल्पना जी। बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 8, 2017 at 1:23pm
बहुत अच्छे विचार । बहुत सुंदर रचना हुई है आदरणीय महेंद्र जी । बधाई स्वीकारें ।
Comment by Mahendra Kumar on March 27, 2017 at 9:12am
हार्दिक आभार आदरणीय राम जी।
Comment by Ram Ashery on March 22, 2017 at 3:20pm

 ati sunder 

Comment by Mahendra Kumar on February 23, 2017 at 4:52pm
हार्दिक आभार आदरणीय गिरिराज सर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 23, 2017 at 7:54am

आदरनीय महेन्द्र भाई , बहुत सुंदर और सही लगी आपकी कविता , हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Mahendra Kumar on February 21, 2017 at 5:33pm
कविता को पसंद करने के लिए आपका हृदय से आभार आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी। सादर।
Comment by Mahendra Kumar on February 21, 2017 at 5:31pm
अपनी टिप्पणी से रचना को मान देने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय सुशील सरना जी।
Comment by Mahendra Kumar on February 21, 2017 at 5:30pm
आपको कविता पसंद आयी, लिखना सार्थक रहा आदरणीय समर कबीर सर। बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर।
Comment by Mahendra Kumar on February 21, 2017 at 5:29pm
शुक्रिया आदरणीय शिज्जु "शकूर" जी। सादर।

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