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जो तू आये तो मैं निखरूँ-पंकज द्वारा गज़ल

तेरी राहों में ठहरा हूँ
जो तू आये तो मैं निखरूँ

यहाँ चाहत हज़ारों हैं
इज़ाज़त हो तो सब कह दूँ

ज़माने को बता भी दो
ग़ज़ल तुम पर ही सब लिक्खूँ

अभी माटी का पुतला है
छुएँ जो राम तो बोलूँ

सुदामा है गरीबी में
किशन आये तो धन पाऊँ

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 24, 2017 at 9:32pm
आदरणीय अग्रज को सादर प्रणाम, बहुत बहुत आभार

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 24, 2017 at 9:28pm

आदरनीय पंकज भाई , अच्छी गज़ल कही है छोटी बहर मे , बधाई प्रेषित है ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 23, 2017 at 1:21pm
आदरणीय सुरेंद्र सर आप से मिलने वाला स्नेह मुझे लगातार बल प्रदान करता है सादर धंयवाद
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 23, 2017 at 1:20pm
ही ही ही, आदरणीय रवि भैया मुझसे एक बार फिर गलती हो गई, 1222 1222 बह्र हे
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 23, 2017 at 1:15pm
आदरणीय बाऊजी जी सादर प्रणाम बहुत बहुत आभार
Comment by Ravi Shukla on January 23, 2017 at 1:13pm

आदरणीय पंकज जी अच्‍छी गजल   हुई हैै  इसकी बह्र शायद  122 122 है इस गजल में कथ्‍य अधिक उभर कर आया है बधाई स्‍वीकार करें 

Comment by नाथ सोनांचली on January 23, 2017 at 8:59am
आद0 पंकज जी सादर अभिवादन, अच्छी गजल कही अपने, दाद के साथ मुबारकबाद कबूल फरमाएँ
Comment by Samar kabeer on January 22, 2017 at 1:51pm
अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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