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फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ा

दौर-ए-जवानी के हमको रंगीन ज़माने याद आये
महफ़िल में यारों से वो साग़र टकराने याद आये

तन्हाई में भूले बिसरे सब अफ़साने याद आये
जिनमें ग़म की रातें गुज़रीं, वो मैख़ाने याद आये

दिल मुट्ठी में लेकर कोई भींच रहा यूँ लगता था
ग़म की काली रातों में जब ख़्वाब सुहाने याद आये

इक मुद्दत के बाद ख़ुशी ने दरवाज़े पर दस्तक दी
दिल घबराया और मुझे कुछ यार पुराने याद आये

सब कुछ खोकर बर्बादी के सहरा में जब जागे हम
अपनों की साज़िश के सारे ताने बाने याद आये

हमने देखा हर शाइर के होटों पर ये मिसरा था
"तुम याद आये और तुम्हारे साथ ज़माने याद आये"

--समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on December 29, 2016 at 11:18pm
जनाब सुरेन्द्र नाथ जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on December 29, 2016 at 11:16pm
जनाब गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on December 29, 2016 at 11:14pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी आदाब,जिस दिन से ओबीओ का सदस्य बना हूँ ,पहली बार ऐसा हुवा कि मुशायरे में शिर्कत नहीं कर सका ।
ग़ज़ल में शिर्कत और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on December 29, 2016 at 11:10pm
जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on December 29, 2016 at 11:07pm
जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,कुछ मजबूरी ही ऐसी थी कि मुशायरे में चाहते हुए भी शिर्कत नहीं कर सका,आप जानते ही होंगे ,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on December 29, 2016 at 11:03pm
जनाब तेजवीर सिंह जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on December 29, 2016 at 11:01pm
जनाब अशोक कुमार रक्ताले जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by जयनित कुमार मेहता on December 29, 2016 at 6:35am
आदरणीय समर कबीर जी!
बेहद खूबसूरत ग़ज़ल बन पड़ी है। हार्दिक बधाई।।
Comment by नाथ सोनांचली on December 27, 2016 at 10:39pm
आदरणीय समर कबीर साहब प्रणाम, नेरा अहोभाग्य है की आप जैसे लोगो का सानिध्य में कुछ सीख पा रहा हूँ, कितना बढ़िया लय बद्ध गजल मिली पढने को, क्या कहूँ, बेहतरीन। इन गजल को देखकर समझ आता है की आखिर गजल लिखे कैसे जाते है। आपको बेहतरीन गजल कहने के लिए मेरी अशेष बधाइयाँ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 27, 2016 at 12:07pm

आदरणीय समर कबीर जी, आपकी तरही ग़ज़ल से यह समझ में आया कि इन काफियों के साथ इस बह्र में कितने सहज मिसरे निकले जा सकते है. मिसरों में लफ़्ज़ों को आप जैसा बरतते हैं, वह सीखने वाली बात है. फिर क्या ही असरदार जुमले निकलते हैं. वाह........

इस बार के मुशायरे में आपकी कमी महसूस हुई, लेकिन कारणों का भी मुझे भान है. खैर आपकी तरही ग़ज़ल यहाँ पढने मिल गई.  इस शानदार ग़ज़ल पर दिल से दाद के साथ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं. सादर 

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