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मग़र मड़ई छवानी है, कमाना भी ज़रूरी है------पंकज द्वारा ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222
चलूँ स्कूल लेकिन घर में दाना भी ज़रूरी है
पढूँगा तो मग़र ये घर बचाना भी ज़रूरी है

ग़रीबी श्राप है इस श्राप से है मुक्ति शिक्षा में
मग़र मड़ई छवानी है, कमाना भी ज़रूरी है

मुझे मालूम है कूड़े में मिलते रोग के कीड़े
ये कचरे ही मेरी रोजी, जुटाना भी ज़रूरी है

उसे भी छोड़िये, पिल्लू अभी भैंसें ले जाएगा
बहुत महँगा हुआ दर्रा, चराना भी ज़रूरी है

हमारे गाँव की चट्टी पे, पे टी एम् नहीं होता
तो मुर्री में बचत अपनी छिपाना भी ज़रूरी है

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 17, 2016 at 5:57pm
आदरणीय निर्मल सर बहुत बहुत आभार
Comment by Nirmal Nadeem on December 8, 2016 at 2:54am
भाई , मड़ई का जवाब नहीं। वाह वह वाह
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 4, 2016 at 12:34pm
आदरणीय महेंद्र जी बहुत बहुत आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 4, 2016 at 12:34pm
आदरणीय अमिता जी बहुत बहुत आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 4, 2016 at 12:33pm
आदरणीय गिरिराज सर सादर प्रणाम, आशीष प्रदान करने के लिए हार्दिक आभार। छिपाना वाला मामला, संदेहास्पद लग रहा है, आपका सुझाव सर्वथा सही लग रहा है
Comment by Mahendra Kumar on December 3, 2016 at 10:37pm
आदरणीय पंकज भाई जी, इस शानदार ग़ज़ल के लिए शेर दर शेर दाद के साथ मुबारक़बाद क़ुबूल कीजिए।
Comment by amita tiwari on December 3, 2016 at 7:12pm

बहुत सच्ची रचना ,यथार्थ पर पैर  जमाये 

बहुत बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 3, 2016 at 9:53am

आदरणीय पंकज भाई , खूब सूरत गज़ल हुई है , दिल से बधाइयाँ स्वीकार कीजिये ।

अ6तिम शे र के सानी  मिसरा  पर मुझे थोड-आ संदेह है -- तो मुर्री में बचत अपनी छिपाना भी ज़रूरी है  --  शायद ये ठीक हो --
तो मुर्री में बचत अपनी छिपानी भी ज़रूरी है   -- अभी देखिए जानकार क्या कहते हैं ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 2, 2016 at 4:30pm
आदरणीय लक्ष्मण सर बहुत बहुत आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 2, 2016 at 4:28pm
आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम। बहुत बहुत आभार

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