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अजनबी गलियाँ

चलते चलते
महसूस हुआ
गलियाँ बेगानी लगीं
देखते रहे
इधर उधर
नज़रे बैमानी लगीं
थे बहुत अपने यहाँ
पर सभी बेगाने लगे
खोजा बहुत उन सबको
शायद कोई अपना लगे ।
तंग गलियों में
चिपके हुए घरों के बीच
बस देखती रही यूँही ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on November 10, 2016 at 12:48pm
धन्यवाद आदरणीय गिरिराज सर ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 10, 2016 at 8:49am

आदरनीया कल्पना जी , छोटी पर अच्छी कविता रची है आपने , हार्दिक बधाई ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on November 6, 2016 at 8:14pm
आदाब जनाब समर साहब । जी आपने सही कहा दसवी पंक्ति में एना ही होना चाहिए । सादर ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on November 6, 2016 at 8:13pm
सादर धन्यवाद आदरणीय सुशील सरना जी । आपको ये कविता पसंद आई सार्थक हुआ यह प्रयास । त्रुटियों के क्षमा चाहती हूँ। सादर
Comment by Samar kabeer on November 6, 2016 at 3:03pm
मोहतरमा कल्पना भट्ट साहिबा आदाब,मुख़्तसर लेकिन दमदार कविता लिखी है आपने,अपने जज़्बात को अच्छे अल्फ़ाज़ दिए हैं ,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
दसवीं पंक्ति में 'शायद कोई अपने लगे' को "शायद कोई अपना लगे"करना उचित होगा क्या ?
Comment by Sushil Sarna on November 6, 2016 at 2:18pm

वाह आदरणीया कल्पना जी  ... कम शब्दों में भावों की गहनता को आपने बड़ी ही शिद्दत से पेश किया है। दिल से बधाई स्वीकार करें। ''मेहसूस '' को कृपया महसूस  कर लेवें। 

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