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ज़िंदगी अजीब होती जा रही है

ये ज़िंदगी
कितनी
अजीब होती
जा रही है
कैसे
हाथों से
निकलती
जा रही है
माथे पर सिंदूर
हुआ करता था
औरत का गहना
अब साड़ी भी
स्कर्ट होती
जा रही है
शादी को होते
नहीं महीने दो
तलाक़ की
क़तार बड़ी
जा रही है
लड़के नही
मिलते होश
में अब तो
ये शराब
बोहत सस्ती हुई
जा रही है
बच्चे के सोने
का इंतज़ार
है माँ को
पार्टी की
रौनक़ बूझतीं
जा रही है
संस्कार दिया
करो पहले
बसता किताबों
का बाद में
क्यूँकि
हर किसी के
ह्रदय में
मानवता
घटती
जा रही है
ये ज़िंदगी
अजीब होती
जा रही है
हाथों से निकलती
जा रही है
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on September 26, 2016 at 3:12am
कविता अच्छी है , जिंदगी तो मुठ्ठी में रेत होती है , फिसलती जाती है।
पर जो हालात बयान किये हैं वे इसलिए ऐसे हैं क्योंकि जीवन के हर क्षेत्र में राजनीति हावी है।
शिक्षा -संस्कार दोनों राजनीति मुखी हो गए हैं , रास्ता बताने और बनाने वाला कोई नहीं है , रोकने वाले सब जगह हैं।
प्रस्तुति पर बधाई , सादर।
Comment by S.S Dipu on September 25, 2016 at 11:35pm
सुरेश कुमार कल्याण जी
आभार
Comment by S.S Dipu on September 25, 2016 at 11:34pm
धन्यवाद आपका Shyam Narain Verma ji
आभार
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 25, 2016 at 7:59pm

अब नारी भी मोम की गुडिया नहीं रही , वह भी बदलती जा रही है ------------------ आमीन ,

Comment by Shyam Narain Verma on September 23, 2016 at 2:44pm
बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति , बधाई आप को | सादर 
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 23, 2016 at 1:20pm
आदरणीया दीपू जी यथार्थ को दर्शाती बहुत ही सुन्दर रचना।मनोवेग तेज हो गए पढकर।हार्दिक बधाई स्वीकार करें । सादर ।

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