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प्रजातंत्र के देश में, परिवारों का राज

वंशवाद की चौकड़ी, बन बैठे अधिराज |

वंशवाद की बेल अब, फैली सारा देश

परदेशी हम देश में, लगता है परदेश  |

लोकतंत्र को हर लिये, मिलकर नेता लोग

हर पद पर बैठा दिये, अपने अपने लोग |

हिला दिया बुनियाद को, आज़ादी के बाद

अंग्रेज भी किये नहीं,  तू सुन अंतर्नाद |

संविधान की आड़ में, करते भ्रष्टाचार

स्वार्थ हेतु नेता सभी, विसरे सब इकरार |

बना कर लोकतंत्र को, खुद की अपनी ढाल

लूट रहे नेता सकल, जनता का सब माल |

हर पद पर परिवार के, सदस्य विराजमान

विनाश क्या होगा कभी, रक्तबीज संतान ?

प्रजा करे अब फैसला, करे साफ़ परिवार

जनता से मंत्री बने, मिले राज अधिकार |

मौलिक व् अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Kalipad Prasad Mandal on September 13, 2016 at 10:26pm

आदरणीय रामबली जी , विस्तृत विश्लेषण के लिए धन्यवाद | आपका कहना् बिलकुल सही है कि प्रत्येक दोहा अपने आप में पूर्ण होता है ; किसी दुसरे दोहे पर निर्भर नहीं होता है जैसे ग़ज़ल का हर शेर;  पंरतु कुछ मुसल्सल ग़ज़ल  होते हैं जिसमे परोक्ष रूप में अर्थ की दृष्टि से एक दुसरे से जुड़े होते हैं | मैंने यहाँ एक ही विषय पर सभी दोहे लिखे हैं जिसका विषय है आज का "लोकतंत्र " शीर्षक से | इसीलिए पढ़ते वक्त पाठक के दिमाग में  राजनीतिक दृश्य ही घुमती रहेगी ; इसीलिए आज़ादी के बाद बुनियाद को किसने हिलाया और किसको अंतर्नाद सुनने के लिए कहा गया है,समझने में किसी को दिक्कत नहीं होगी | परिवार वाद से जुड़े सभी को रक्तबीज के संतान कहा गया है, जिनकी संताने आजादी के बाद से एक के बाद सत्ता पर आसीन होते आ रहे है | इसे भी समझने में किसी दिक्कत नहीं होगी | हाँ आपकी इस बात से मैं सहमत हूँ कि हर दोहा जब अलग से पढ़ा जाय तो उसका अर्थ बिना किसी  दिक्कत के समझमें आना चाहिए | इसका प्रयास करेंगे | सादर        

Comment by Kalipad Prasad Mandal on September 13, 2016 at 9:52pm

आदरणीय  सुशील समा जी, दोहे आपको अच्छे लगे जानकर ख़ुशी हुई |  प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद |

Comment by Kalipad Prasad Mandal on September 13, 2016 at 9:48pm

आदरणीय समर साहिब आदाब  और ईद की हार्दिक शुभकामनाएं | ईद मुबारक हो आपको और सभी बंधुओं को |

दोहे की तारीफ के लिए तहे दिल से धन्यवाद | आपके सुझाव के अनुसार सुधार कर रहा हूँ | सादर  

Comment by Samar kabeer on September 13, 2016 at 5:45pm
जनाब रामबली गुप्ता साहिब आदाब,में तो आपकी बात पूरी तरह समझ गया कि जिस तरह ग़ज़ल का हर शैर अपने आप में इकाई का दर्जा रखता है ठीक उसी तरह दोहा भी अपने आप में इकाई का दर्जा रखता है,आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।
Comment by रामबली गुप्ता on September 13, 2016 at 4:47pm
अव्वल तो आदरणीय कालीपद भाई जी को सुंदर प्रयास के लिए दिल से बधाई।
जहां तक आदरणीय समर भाई साहब का विश्लेषण है मैं उससे पूरी तरह सहमत हूँ। साथ ही बताना चाहूँगा कि ग़ज़ल के शेरों की भाँति हर दोहा भी अपने आप में एक मुकम्मल संदेश/भाव रखता है। यदि किसी दोहे के भाव किसी अन्य दोहे के भावों पर आश्रित हों तो यह त्रुटिपूर्ण होगा। तातपर्य यह है की कोई दोहा चाहें अकेले हो या दोहों के समूह में पूर्णतया स्वतंत्र ख्याल रखते हैं। आपका यह दोहा लीजिये
हिला दिया बुनियाद को, आज़ादी के बाद।
अंग्रेज भी किये नहीं, तू सुन अंतर्नाद।।
यदि आप किसी पाठक के सम्मुख सिर्फ यह दोहा रखें तो पाठक के मन में कुछ सवाल इस प्रकार उठेंगे-
1-किसने बुनियाद को हिला दिया?
2-कौन अंतर्नाद सुने और क्यों? आदि
इसी प्रकार इस दोहे को लीजिये-
हर पद पर परिवार के, सदस्य विराजमान।
विनाश क्या होगा कभी, रक्तबीज संतान ?

अब पाठक के मन में एक सवाल ये होगा की
किसके पद पर और किसके परिवार के सदस्य?
कौन रक्तबीज संतान?
इसी प्रकार एक-दो और दोहों में यही स्थिति है।
वास्तव में इन दोहों के वास्तविक भावार्थ अन्य दोहों के भावों पर आश्रित हैं जो उचित नही।सादर
Comment by Sushil Sarna on September 13, 2016 at 12:34pm

आदरणीय वर्तमान को चित्रित करते सार्थक दोहों के लिए हार्दिक बधाई। आ. समर कबीर साहिब द्वारा इंगित की गई त्रुटियों से मैं सहमत हूँ। 

Comment by Samar kabeer on September 13, 2016 at 11:33am
जनाब कालीपद प्रसाद जी आदाब,अच्छे दोहे हुए,बधाई स्वीकार करें ।
"वंशवाद की बेल अब, फैली सारा देश"इस पंक्ति में व्याकरण दोष लगता है,देखियेगा ।
तीसरे दोहे की पहली पंक्ति में 'हर लिया'को "हर लिये और दूसरी पंक्ति में 'बैठा दिया' को "बैठा दिये"होना चाहिये ।
छटे दोहे की पहली पंक्ति में'ख़ुद का अपना ढाल'को इस तरह होना चाहिए "ख़ुद की अपनी ढाल" "ढाल"स्त्रीलिंग है ।

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