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ग़ज़ल - अगर विरोधों मे फँस जायें तो दंगा तो है ही ( गिरिराज भंडारी )

22  22  22  22  22  22  22 ( बहरे मीर )

ज्यूँ तालों में रुका हुआ पानी, गंदा तो है ही 

राजनीति में नीति नहीं तब वो धंधा तो है ही

 

अब भाषा की मर्यादा छोड़ें, गाली भी दे लें

अगर विरोधों मे फँस जायें तो दंगा तो है ही

 

दिखे केसरी, हरा न दीखे. तो फिर कानूनों में

घुसा हुआ कोई बन्दा निश्चित अंधा तो है ही

 

डरो नहीं ऐ भारतवासी पाप करम करने में

मैल तुम्हारे धोने को अब माँ गंगा तो है ही

 

सारे झूठे , हाथों में पत्थर ले कर निकलें हैं

अगर मिला ना सच्चा कोई ये बन्दा तो है ही

 

फोकट डर के आप करें न मन छोटा कर्ता के

देश विदेशों से आया आखिर चंदा तो है ही

 

ये संस्कारी है तो इसको ही सुननी है बातें

उसका क्या है वचन करम से वो नंगा तो है ही

*************************************

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 9, 2016 at 9:42pm

वाह  ...हार्दिक बधाई आपको आदरणीय गिरिराज  जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 6, 2016 at 10:51am

आदरणीया प्रतिभा जी , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया आपका


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 6, 2016 at 10:50am

आदरनीय रवि भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका ह्र्दय से आभार , मुझे आ. समर  का सुझाया मिसरा पहले ही स्वीकार है , बात केवल ये जानने के लिये हुई है , डरो नहीं ऐ भारतवासी  -- व्याकरण के अनुसार सही है या गलत ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 6, 2016 at 10:48am

आदरनीया कांता जी , गज़ल की सराहना के लिये आपका आभार ।

Comment by pratibha pande on September 5, 2016 at 8:31pm

 

डरो नहीं ऐ भारतवासी पाप करम करने में

मैल तुम्हारे धोने को अब माँ गंगा तो है ही..... वाह  ...हार्दिक बधाई आपको आदरणीय गिरिराज जी .इस शानदार ग़ज़ल के लिए 

 

Comment by Ravi Shukla on September 5, 2016 at 5:07am
आदरणीय गिरिराज भाईजी शानदार कथ्य के साथ बढ़िया ग़ज़ल कहने के लिए बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें
सारे झूठे , हाथों में पत्थर ले कर निकलें हैं
अगर मिला ना सच्चा कोई ये बन्दा तो है ही क्या खूब बात कही है दाद क़ुबूल करें।
भाषा और व्याकरण के जानकार जो भी कहते हो इस बह्र के प्रवाह के अनुसार आदरणीय समर साहब का मिसरा डरो नहीं भारत के लोगो पाप कर्म करने से , सुनाने और पढ़ने में तो अच्छा लग रहा है। बाकी लेखक की वैचारिक स्वतंत्रता के हम।सदैव पक्षधर है ।
या सुन्दर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए । सादर
Comment by kanta roy on September 4, 2016 at 3:06pm
डरो नहीं ऐ भारतवासी पाप करम करने में
मैल तुम्हारे धोने को अब माँ गंगा तो है ही
----- वाह! क्या खूब कटाक्ष हुआ है यहाँ आपका आदरणीय गिरीराज जी। बेहतरीन गजल पेश की है आपने। बधाई आपको
Comment by Samar kabeer on September 2, 2016 at 9:06pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब,में ये नहीं कह रहा कि आपका मिसरा सही नहीं है,अचानक ये मिसरा दिमाग़ में आया तो इसलिये लिख दिया कि भूल न जाऊं,हम जिन गुणीजनों का इंतिज़ार कर रहे हैं वो शायद ही आएं वैसे दो एक दिन देख लें,बाद में फैसला तो आप ही को करना है, में हिन्दी में अनाड़ी हूँ भाई ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2016 at 8:20pm

आदरणीय तस्दीक भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया आपका ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2016 at 8:19pm

आदरनीय समर भाई , आप की सलाह बिलकुल सटीक है , मुझे स्वीकार है । लेकिन एक बात रह ही जायेगी कि क्या मेरा मिसरा सच मे गलत है , इसलिये सुधार दो एक दिन बाद करूँगा , वही जो आपने सुझाया है ।

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