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इच्छापूर्ति(लघुकथा)राहिला

"चलो अच्छा है,आखिरकार जीजाजी के सर का बोझ कुछ तो हल्का हुआ"
"अरी! अब तो बाकी की दोनों लड़कियाँ झट से निपट जाएँगी ।ये तो सुचि ही रंगरूप में इतनी गयीबीती थी, कि चार साल लग गए मौसाजी को चप्पल चटकाते ।उन दोनों के रिश्तों की तो लाइन लगी है।"
"वो तो आज भी चप्पल ही चटकाते फिरते ,अगर सुचि ने लड़का खुद पसंद न किया होता तो।"
"हाय...,क्या कह रही हो? तो क्या ये पसंद की शादी है।"
"और क्या। सहकर्मी है सुचि का।"
"लेकिन लड़के ने इसमें क्या देखा ?"
"उसकी सरकारी नौकरी और क्या?"वो मुँह बना के बोली।
इतने में बारात का शोर उठा।सभी दरवाजे की ओर दौड़ी।
"हे भगवान ये लड़का है या भूतनाथ?"सुचि की मौसी दूल्हा देख,उलटे पाँव उसके के कमरे में लौटी।
"हाय री ...!ये तूने क्या किया ।और सब कह रहे हैं ।तेरी पसन्द की शादी है।"
"क्या हुआ मौसी?"
"क्या हुआ ?क्या देखा बिटिया तूने लड़के में ?इतना कुरूप।"
"तो क्या हुआ मौसी, मैं भी कौन सी सुंदर हूँ"
"तेरा दिमाग खराब है लाड़ो !इससे तो तू लाख गुना सुंदर है।फिर ऐसा क्यूँ किया?"
"आह...,लाख गुना सुंदर!!"उसने आँखें बंद कर कई बार इस जुमले को दोहराया।और तृप्त आत्मा से बोली-"यही सुनने के लिए मौसी!जिसे जीवन में अपने लिए कभी नहीं सुना और आज के बाद हमेशा सुनूंगी।"
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Rahila on July 22, 2016 at 11:14am
बहुत शुक्रिया आदरणीया नयना दीदी!सादर
Comment by Ravi Prabhakar on July 22, 2016 at 7:43am

ये कथा मैनें कल सुबह ही पढ़ ली थी । लगभग एक दिन के विचार के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि इस लघुकथा का रूख व्‍यंग्‍य और लतीफे की महीन रेखा को पर कर लतीफे की ओर अधिक चला गया है। कथा की अंतिम पंक्‍ित /आह...,लाख गुना सुंदर!!"उसने आँखें बंद कर कई बार इस जुमले को दोहराया।और तृप्त आत्मा से बोली-"यही सुनने के लिए मौसी!जिसे जीवन में अपने लिए कभी नहीं सुना और आज के बाद हमेशा सुनूंगी।"/ पढ़ने के बाद पाठकीय संवेदनाएं नायिका से नहीं जुड़ पा रही हैं। बस नायिका की युक्‍ित पर हंसी ही आती है कि अपना तथाकथित अवगुण छिपाने के लिए उसने  'अंधो में काना राजा' जैसी चालाकी का सहारा लिया। और लघुकथा का शीर्षक इच्‍छापूर्ति भी कुछ कुछ खानापूर्ति जैसा ही लगा जिस पर अधिक गंभीरता से सोचा नहीं गया है। शीर्षक लघुकथा का सबसे अहम् हिस्‍सा होता है जिसे दुर्भाग्‍यवश इग्‍नोर ही कर दिया जाता है। आपसे गंभीर व सुलझी हुई रचनाओं की अपेक्षा होती है आदरणीय राहिला जी जिसमें आज आपने निराश किया है। क्षमासहित सादर ।

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 21, 2016 at 10:06pm

मन की पीड़ा से उबरने का प्रयास दर्शाती रचना हेतु सादर बधाई स्वीकार करें, आदरणीया राहिला जी| रचना यह प्रश्न भी खड़ा करती है कि शादी-ब्याह के लिये चेहरे की खूबसूरती ज़्यादा ज़रूरी है या फिर उत्तम चरित्र और व्यवहार? 

Comment by नयना(आरती)कानिटकर on July 21, 2016 at 9:31pm

 वाह राहिला जी  "जिसे जीवन में अपने लिए कभी नहीं सुना और आज के बाद हमेशा सुनूंगी।" दिल की ये कसक आपने बडी अच्छे से निभाई रचना मे. बधाई

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