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ग़ज़ल : बना कर इक बड़ी लाइन

1222 1222 1222 1222

बना कर इक बड़ी लाइन कई बीमार बैठे हैं,
उन्हींके साथ में कितने यहां एमआर बैठे हैं।

न जाने सेल को किसकी नज़र ये लग गई यारब,
रिटेलर सब हमारी कोशिशों के पार बैठे हैं ।

ये जितने डाक्टर है सब मुझे जल्लाद लगते है,
मरीजो को दवा क्या दें लिए तलवार बैठे हैं।

मरीजे इश्क हैं सारे इन्हें मतलब नज़ारे से,
लिए आँखों में कब से हसरते दीदार बैठे हैं।

दुपहिया धूप में रक्खा उठा कर चल पड़े थे वो,
बयाँ के बाद की तकलीफ में सरकार बैठे हैं।

हमें खाली लिफ़ाफ़ा वो थमाकर देखिये खुद ही,
वलीमा खा गये कितने कई तैयार बैठे हैं ।

भला क्यों मुफ़्त का हर माल ग़ालिब को लगा अच्छा,
बतायें तो बड़े नक्काद जो हुशियार बैठे हैं ।

चुरा ली जूतियां मेरी किसी ने कल जो हुजरे से,
कसम से मिल वो जाये आज खाये खार बैठे हैं।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 24, 2016 at 4:42pm

बेहद खूब कटाक्ष करती हुई ग़ज़ल आदरणीय....जय हो 

Comment by vijay nikore on April 24, 2016 at 4:12pm

 गज़ल अच्छी लगी। बधाई।

Comment by Ravi Shukla on April 24, 2016 at 3:31pm
आदरणीय आशुतोष जी ग़ज़ल के भाव आपको पसंद आये धन्यवाद । आदरणीय शिज्जु जी से कुछ मुद्दों पर चर्चा हो रही थी उसी पर कुछ मजाहिया लहज़े में कुछ शेर सामने आ गए तो आप सब के साथ साझा कर ली । पुनः धन्यवाद आपका । सादर ।
Comment by Ravi Shukla on April 24, 2016 at 3:28pm
आदरणीय धर्मेन्द्र जी बहुत बहुत शुक्रिया अशआर आपको पसंद आये । आभार स्वीकार करें ।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 24, 2016 at 1:36pm

अच्छे अश’आर हुए हैं आदरणीय रवि शुक्ला जी, दाद कुबूल करें।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 24, 2016 at 11:19am

आदरणीय रवि सर ..आपकी यह रचना वर्तमान परिदृश्य को एक मंजर की तरह आँखों के आगे उकेर देने में सक्षम है ..आपके हर शेर से मैं इत्तेफाक रखता हूँ कमाल की इस रचना के लिए ह्रदय से बधाई स्वीकार करें सादर 

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