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दिलों को लूटती मेरी ग़ज़ल (राज)

१२२२ १२२२ १२

जदल से ऊबती मेरी ग़ज़ल

मुहब्बत ढूँढती मेरी ग़ज़ल

 

कहाँ वो प्यार उल्फ़त का जहाँ 

कलम से पूछती मेरी ग़ज़ल

 

कदूरत के समंदर चार सू

किनारा ढूँढती मेरी ग़ज़ल

 

न खिड़की है न रोशनदान है

जिया बिन सूखती मेरी ग़ज़ल

 

सुलगते तल्खियों के अर्श पे

सितारे  गूँथती मेरी ग़ज़ल

 

लिखे हर बार लफड़े रोज के

कसम से टूटती मेरी ग़ज़ल

 

अमन का रंग गर मिलता यहाँ

दिलों को लूटती मेरी ग़ज़ल

 

ख़ुलूसे-उल्फतों का जाम पी

नशे में झूमती मेरी ग़ज़ल 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 4, 2016 at 9:52pm

मोहतरम तस्दीक अहमद साहब,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना कामयाब हुआ तहे दिल से शुक्रिया कबूल कीजिये | 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 4, 2016 at 9:43pm

मोहतरमा राजेश कुमारी साहिबा ,  छोटी बह्र में बेहतर ग़ज़ल  आपने कही है शेर दर शेर दाद और  मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 4, 2016 at 8:40pm

आ० डॉ० आशुतोष जी ,आपका दिल से बहुत बहुत शुक्रिया | 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 4, 2016 at 7:01pm
आदरणीया राज जी इस ग़ज़ल पर हार्दिक शुभकामनाएं सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 4, 2016 at 6:15pm

बहुत बहुत शुक्रिया नरेन्द्र सिंह जी 

Comment by narendrasinh chauhan on April 4, 2016 at 1:42pm

सुन्दर रचना 

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