For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

फिर जमाने से बशर दर्द छुपाता क्यूँ है (फिलब्दीह ग़ज़ल 'राज')

बेवजह बात जिरह करके बढाता क्यूँ है                                                                                                                             एक मासूम पे इल्जाम लगाता क्यूँ है

 

खोल देती हैं सभी राज पनीली आँखें                                                                                                                               फिर जमाने से बशर दर्द छुपाता क्यूँ है

 

हो गया आज क्यूँ इंसा की तरह आईना ,

सच छुपाकर ये सदा झूठ दिखाता क्यूँ हैं

 

 

भर रहा था जो अभी वक़्त से धीरे धीरे

,तू उसी जख्म पे तेज़ाब लगाता क्यूँ है

 

 

छेड़ कुदरत से करेंगे तो बुरा होगा हश्र,

ऐसे आफ़ात बशर पास बुलाता क्यूँ है .

 

 

कल चुभेंगे वही पैरों में तेरे अपनों के,                                                                                        

राह में ख़ार किसी के तू बिछाता क्यूँ है

 

 

छीन लेती है कज़ा रूह को जब भी चाहे,

फिर खुदा जिस्म से उसको यूँ मिलाता क्यूँ है.

--------------मौलिक एवं अप्रकाशित 

 

 

 

Views: 493

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 1, 2016 at 8:25pm

आ० लक्ष्मण धामी भैय्या आपको ग़ज़ल पसंद आई बहुत- बहुत आभार आपका. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 1, 2016 at 8:24pm

आ० तेजवीर सिंह जी ,आपकी सराहना पाकर मेरा लेखन कर्म सार्थक हो गया |दिल से बहुत आभारी हूँ सादर .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 1, 2016 at 8:23pm

आ० समर भाई जी ,पोस्ट पर बहुत दिनों बाद आना हुआ एक महीने से बहुत ही ज्यादा व्यस्त थी |प्रत्युत्तर में विलम्ब के लिए क्षमा चाहती हूँ |आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ |आपकी बात का अगली बार पूर्ण ध्यान रखूंगी ग़ज़ल के अरकान जरूर लिखा करूंगी |आपका दिल से बहुत- बहुत आभार. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 27, 2016 at 11:46pm

आदरणीया राजेश दीदी, ग़ज़ल की बह्र या वज़्न ....?. सादर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 26, 2016 at 11:01am

आ० राजेश दी इस लाजवाब ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई l

Comment by TEJ VEER SINGH on January 25, 2016 at 6:14pm

हार्दिक बधाई आदरणीया राजेश कुमारी जी!!बेहतरीन गज़ल!एक एक शेर बहुत लाज़वाब है!पुनः बधाई!

     खोल देती हैं सभी राज पनीली आँखें                                                                                                                               फिर जमाने से बशर दर्द छुपाता क्यूँ है

Comment by Samar kabeer on January 25, 2016 at 5:36pm
बहना राजेश कुमारी जी आदाब,फ़िलबदीह ग़ज़ल में आपको कमाल हासिल है,ये पहले भी कह चुका हूँ,ये ग़ज़ल भी शानदार रही,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं !
देख रहा हूँ कि आजकल मंच पर ग़ज़ल के अरकान कुछ सदस्य ही लिखते हैं,जूनियर तो जूनियर हैं,सीनियर्स को इसका ख़ास ख़याल रखना चाहिये,सही है न ?

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

दोहा पंचक. . . .संयोग शृंगारअभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Friday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Feb 3

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service