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सबसे बडा दुख (लघुकथा)

सत्तर वर्षीय राजेश जी के इकलौते बेटे किशोर की मृत्यु पिछले साल एक कार दुर्घटना में हो गयी थी!पत्नी की मृत्यु किशोर की शादी से पहले ही हो चुकी थी! अब परिवार के नाम पर राजेश जी और उनकी जवान पुत्र बधु सीमा थी!वह भी बैंक में कार्यरत थी! जवान किशोर की मौत के सदमे ने दौनों को लगभग मूक बना दिया था!दौनों में से कोई किसी से बात चीत  नहीं करते थे!वश यंत्र वत अपने अपने कार्य करते रहते थे! किशोर की बरसी की रस्म पूरी होते ही राजेश जी ने सीमा को समझाया,"सीमा तुम पढी लिखी, सुंदर, जवान और  कामकाजी महिला हो! तुमको अभी भी कोई अच्छा रिश्ता मिल सकता है!मैं सोचता हूं कि अखबार में इश्तिहार दे दूं"!

"नहीं बाबूजी, आपके मन में ऐसा विचार आया कैसे"!

"बेटी, मुझसे तुम्हारा दुख देखा नहीं जाता"!

"बाबूजी, मेरा दुख क्या आपके दुख से भी बडा है!बाप के कंधे पर जवान बेटे की अर्थी दुनियां का सबसे बडा दुख होता है!हम आपको छोड कर कहीं भी नहीं जायेंगे"!

.

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on January 5, 2016 at 6:45pm

हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर साहब जी!लघुकथा पर आप जैसे गुणी और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का आशीर्वाद अपने आप में एक शानदार उपलब्धि है!इसे भविष्य में भी बनाये रखियेगा!दिली शुक्रिया!

Comment by TEJ VEER SINGH on January 5, 2016 at 6:41pm

हार्दिक आभार आदरणीय नीता कसार जी!लघुकथा पर आपकी सार्थक टिप्पणी मेरे उत्साह बर्धन का एक उत्तम माध्यम है!पुनः आभार!

Comment by TEJ VEER SINGH on January 5, 2016 at 6:38pm

हार्दिक आभार आदरणीय सुशील सरना जी!लघुकथा पर आपकी टिप्पणी मेरी मेहनत का पुरुस्कार है!शुक्रिया!

Comment by Samar kabeer on January 5, 2016 at 5:52pm
जनाब तेजवीर सिंह जी आदाब,बहुत ख़ूब लिखते हैं आप,ये रचना भी बहुत ख़ूब है,वाक़ई ये सबसे बड़ा दुःख है,इस अनमोल रचना के लिये तहे दिल से बधाई स्वीकार करें"अल्लाह करे ज़ोर-ए-क़लम और ज़ियादा"
Comment by Nita Kasar on January 5, 2016 at 3:10pm
कथा सशक्त होने के साथ सोचने को विवश करती है।पिता के सामने बेटे का जाना बेहद तकलीफ़दायक होता है।बहू को पितातुल्य ससुर के दर्द का अहसास है ये बाते प्रभावित करती है बधाई आपको आद०तेजवीरसिंह जी ।
Comment by Sushil Sarna on January 4, 2016 at 8:17pm

''बाप के कंधे पर जवान बेटे की अर्थी दुनियां का सबसे बडा दुख होता है''
वाह ,आदरणीय तेजवीर सिंह जी वाह।, आपकी कलम से बहुत ही मार्मिक और सारगर्भित लघुकथा का सृजन हुआ है। हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

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