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सुबह से शाम तक बस काम ही काम।घर में सबसे पहले जागना और सबसे बाद में देर रात गए सो पाना।यही मीना की दिनचर्या थी।काम करने में उसे आनंद ही आता था।दो देवरानियां और एक जेठानी।चारों में अकेली शिक्षित और काम भी सबसे ज्यादा मीना ही करती थी।
इस सबके बावज़ूद जेठानी की हृदय चीरती बातें सुननी पड़ती।उसकी कोई भी बात ऐसी न होती जो ताना न हो।कभी उसके पति को, कभी उसके बच्चों को तो कभी उसे ही ओछे स्तर की बात जेठानी गाहे बगाहे बोलती रहती।
पति को उसके द्वारा कहा जाता कि ऐसी बातें वह नहीं सह पाती।पति बस ध्यान न दिया करो कह कर टाल जाता।इससे पति-पत्नी में कटुता बढ़नी शुरू हो गई।
"दिन भर काम और साथ में दुनिया भर के उलाहने।अब नहीं सहन होता।जो कुछ नहीं करता उसी से खरी खोटी सुनो और ख़ुद कोल्हू का बैल बनकर काम में लगे रहो।शिक्षित होना ही अभिशाप बन गया है मेरे लिए।और ये (पति)कुछ समझते ही नहीं।"
ऐसे विचार दिमाग में आते रहते।
मन में एक भयंकर विचार आया,"जीवन से पलायन ही इस नारकीय यातना से छुटकारा है।"
"माँ!आ से आम हाथ पकड़ कर लिखवाओ ना प्लीज़।"
चार साल की बेटी के आग्रह ने उसके मन को पहले थोडा और व्यथित ; फ़िर अपने विचार से विचलित कर दिया।


मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 11, 2015 at 8:50pm
बहुत बहुत आभार आपका आदरणीया Nita Kasar जी रचना पर उपस्थित होकर उसे सार्थक बनाने के लिए।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 11, 2015 at 8:50pm
बहुत बहुत आभार आपका आदरणीया Nita Kasar जी रचना पर उपस्थित होकर उसे सार्थक बनाने के लिए।
Comment by Nita Kasar on December 10, 2015 at 8:31pm
महिला मन की व्यथा उजागर करती कथा ।बच्चे की सूरत देख सब भूल जाती है उसके मन की उथल पुथल पर ममता बल भारी पड़ जाता जाता है ।बधाई आपको आद०सतविंदर जी ।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 10, 2015 at 12:59pm
जी हाँ आदरणीया राहिला जी!वास्तविक घटना से कुछ कुछ प्रेरित है।अवलोकन करने के लिए हार्दिक आभार।
Comment by Rahila on December 10, 2015 at 12:35pm
अच्छी रचना लगी आदरणीय सतविन्दर सर जी! आसपास की रोजमर्रा की घटना जैसी । सादर
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 10, 2015 at 6:51am
समीक्षार्थ सादर प्रेषित

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