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डरे जो तिमिर से भला क्या मिलेगा - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’(गजल)

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डरे जो तिमिर से भला क्या मिलेगा
लड़ो  जुगनुओं  का  सहारा  मिलेगा /1

हमेशा   नहीं   यूँ   अँधेरा मिलेगा
भले  ही रहे कम  उजाला मिलेगा /2

कहावत है तम की जहाँ बस्तियाँ हों
वहीं   दीपकों   का   बसेरा   मिलेगा /3

चलो  ढूँढते  हैं   उसे   रात  भर अब
कहीं तो तिमिर का किनारा मिलेगा /4

भटक जाओ गर तुम गगन को निहारो
बताता  दिशा   इक  वो  तारा  मिलेगा /5

फकत जागने की  करो कोशिशें अब
जगोगे  अगर   तो   सवेरा   मिलेगा /6

मौलिक व अप्रकाशित
© लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 5, 2015 at 11:16am

आ० भाई शेख शहज़ाद जी,अपनी उपस्थिति से ग़ज़ल का मन बढ़ने और उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 5, 2015 at 11:14am

आ० भाई जयनित  जी , ग़ज़ल के अनुमोदन और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद .स्नेह बनाये रखें l

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 5, 2015 at 11:01am
सभी अशआर ज़बरदस्त हैं, दिल चाहे और ....तहे दिल बहुत बहुत शुक्रिया जनाब,हार्दिक बधाई आपको आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' साहब । हर इन्सान के लिए प्रेरित करती हुई ग़ज़ल।
Comment by जयनित कुमार मेहता on December 5, 2015 at 9:45am
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है,आ. लक्ष्मण जी।।खास कर ये शेर लाजवाब हुआ-
"कहावत है तम की जहाँ बस्तियाँ हों
वहीं दीपकों का बसेरा मिलेगा"

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