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मुझे सच को कभी भी झूठ बतलाना नहीं आता - बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

अरकान -1222  1222  1222   1222

मुझे सच को कभी भी झूठ बतलाना नहीं आता|

तभी तो मेरे घर भी यार नज़राना नही आता|

 

अगर तुम प्यार से कह दो लुटा दूँ जान भी अपनी,

मगर परछाईयों से मुझको टकराना नहीं आता|

 

तड़पकर भूख से मरना मुझे हर पल गवारा है,

मगर आगे किसी के हाथ फैलाना नहीं अता|

 

तू कर दे सर कलम मेरा मगर है बेबसी मेरी,

मुझे दिन को कभी भी रात बतलाना नहीं आता|

 

अगर है शौक पीने का तो ख़ुद जाना तू मयखाने,

किसी के घर तलक चलकर ये मयखाना नही आता|

 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on December 3, 2015 at 7:48pm

अगर है शौक पीने का तो ख़ुद जाना तू मयखाने,
किसी के घर तलक चलकर ये मयखाना नही आता|

वाह इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

Comment by जयनित कुमार मेहता on December 3, 2015 at 2:24pm
वाह! प्रवाहपूर्ण सुन्दर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आपको,आदरणीय बैजनाथ शर्मा जी..
Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on December 3, 2015 at 2:10pm

आदरणीय श्याम वर्मा जी ........ बहुत-बहुत शुक्रिया| 

Comment by Shyam Narain Verma on December 3, 2015 at 12:49pm

बहुत खूब , पूरी ग़ज़ल बहुत उम्दा है , बहुत बहुत बधाई, सादर ,

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