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कितने ही यहाँ जिनके घर अपने नहीं होते

२२१ १२२२ २२१  १२२२ 

कितने ही यहाँ जिनके घर अपने नहीं होते 

क्या होता खुदा जग में गर अपने नहीं होते

 

 हर जुल्म सहा उसने लेकिन न कहा कुछ भी 

पाले हुए पंछी के पर अपने नहीं होते 

था जंगली वो हाथी देता ही कुचल हमको 

गर पास धनुष अपना शर अपने नहीं होते 

बिगड़े न अगर होते बेटे तो यकीनन ही 

रातों में भटकते क्यूँ घर अपने नहीं होते 

चोरी से कहाँ बचते चोरों से बचाते क्या 

मजबूत घरों के गर दर अपने नहीं होते 

इंसा को ठिठुरता यूं देखा तो चिडी बोली 

मर जाते कभी के गर फर अपने नहीं होते 

हाथों में तेरे प्याले आँखों में उदासी क्यूँ 

ऐसे में गले साकी तर अपने नहीं होते 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by Ravi Shukla on November 2, 2015 at 3:29pm

आदरणीय आशुतोष जी बहुत बढ़िया तरही ग़ज़ल हुई है मुशायरे में शिरकत नहीं हो पाई शायद नहीं तो और भी विस्‍तृत दाद मिलती सबसे

इंसा को ठिठुरता यूं देखा तो चिडी बोली 

मर जाते कभी के गर फर अपने नहीं होते  क्‍या बात है आने वाली ठंड का एहसास किस नये तरीके से आपने किया है नया बिंब है बधाई आपको इसके लिये

हाथों में तेरे प्याले आँखों में उदासी क्यूँ 

ऐसे में गले साकी तर अपने नहीं होते  आखिरी शेर तो बहुत ही खूब हुआ है क्‍या बात है आशुतोष जी ऐसे में किसके गले तर होंगे ।  दिली दाद कुबूल करें । इस बार मुशायरे में हाजिर जरूर होइयेगा ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 2, 2015 at 1:02pm

आदरणीय मिथिलेश जी..रचना पर आपकी प्रतिक्रिया से बड़ा हौसला मिलता है ..बस यूं ही सहयोग मिलता रहे इसी कामना के साथ सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 2, 2015 at 1:01pm

आदरणीय शिज्जू जी ..आपकी प्रतिक्रिया से मनोबल बढ़ा है ..आपके साथ मैंने इस मंच पर ग़ज़ल का ये सफ़र शुरू किया था..बहुत मार्गदर्शन मिला आपसे ..इस सफ़र पर आपसे यूं ही हौसला मिलता रहे इसी कामना के साथ सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 2, 2015 at 12:58pm

आदरणीय मनोज जी रचना पर आपकी उत्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से धन्यवाद सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 1, 2015 at 9:53pm

आदरणीय आशुतोष जी बहुत बढ़िया तरही ग़ज़ल हुई है दाद हाज़िर है 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 1, 2015 at 8:03pm
बहुत बढ़िया आदरणीय डॉ आशुतोषजी बधाई स्वीकार करें
Comment by मनोज अहसास on October 30, 2015 at 8:26pm
आदरणीय
बहुत खूब ग़ज़ल हुई है
बधाई
सादर

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