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नहीं मरहम बड़ा कोई ( ग़ज़ल ) - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

1222  1222  1222   1222

नहीं है धार कोई भी समय की धार से बढ़कर
नहीं है भार कोई भी समय के भार से बढ़कर

भरे हैं   धाव   इसने  ही  बड़े  छोटे  सदा सब के
नहीं मरहम बड़ा कोई समय के प्यार से बढ़कर

उलझ मत सोच कर बल है भुजाओं में जवानी का
न देगा  पीर कोई   भी  समय  की  मार से बढ़कर

अगर दोगे समय को मान थोड़ा भी समझ लो तुम
दिलाएगा  सदा   जादा   समय  से  रार  से बढ़कर

कही जाती है ठोकर ठस समय की जग में चाहे सच
सुकोमल भी कहाँ  कुछ  है समय के हार से बढ़कर

रचना मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

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Comment by गिरिराज भंडारी on September 15, 2015 at 9:39am

भरे हैं   धाव   इसने  ही  बड़े  छोटे  सदा सब के
नहीं मरहम बड़ा कोई समय के प्यार से बढ़कर

लाजवाब बात कही आदरणीय लक्ष्मण भाई  , गज़ल के लिये और इस शे र के लिये दिली बधाइयाँ ।

Comment by shree suneel on September 15, 2015 at 8:44am
सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय लक्ष्मण धामी जी. समय की महत्ता को बढि़या शब्द विन्यास मिला. बधाई आपको.
Comment by shree suneel on September 15, 2015 at 8:38am
उलझ मत सोच कर बल है भुजाओं में जवानी का
न देगा पीर कोई भी समय की मार से बढ़कर

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