For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

बजता हूँ बन के साज तेरे मंदिरों में अब (इस्लाही गजल )

2212 2212 2212 22

बजता हूँ बन के साज तेरे मंदिरों में अब,
देता तुझे आवाज  तेरे मंदिरों में अब |

मांगी थी मैंने उम्र की संजीदगी लेकिन, 
क्यों इस तरह  मुहताज तेरे मंदिरों में अब |

मन जिसका देखूं दुश्मनी की नीव पे काबिज़, 
कैसे करूँ परवाज़ तेरे मंदिरों में अब | 

बस रौशनी की खोज में भटका तमाम उम्र
पगला गया, नेवाज तेरे मंदिरों में अब |

ले चल मुझे शमशान, कोई गम जहाँ ना हो, 
मेरा गया हमराज, तेरे मंदिरों में अब |


हर्ष महाजन  

"मौलिक व् अप्रकाशित"


नवाज = ईश्वर/भगवान् 
मंदिर = इंसानी देह  

Views: 1692

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Harash Mahajan on July 31, 2015 at 6:33pm

मैं आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी आपसे से अनुरोध !!

Comment by Harash Mahajan on July 31, 2015 at 6:31pm

आदरणीय समर कबीर जी शुक्रिया आपने आगाह किया ..नहीं तो इंतज़ार में ही वक़्त निकलता....सर कोई बात नहीं मसरूफियत तो किसी को भी हो सकती है...|
मैं आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी अनुरोध करता हूँ वो ही सही रास्ता दिखाएँगे | मिथलेश जी वक़्त मिले तो इश्र भी नज़र डालियेगा |

Comment by Samar kabeer on July 31, 2015 at 4:01pm
जनाब हर्ष महाजन जी आदाब,आपकी ग़ज़ल की उलझी हुई गुत्थी सुलझाने में ज़रूर मदद करता लेकिन आज कल मसरूफियत कुछ बढ़ी हुई है इसलिये ओ बी ओ पर कम समय दे पा रहा हूँ,मैंने आपको इशारे दे दिये है और इस मुआमले में जनाब मिथिलेश वामनकर जी आपकी सहायता कर सकतें हैं, मुझे खेद है की इस समय आपकी कोई मदद नहीं कर पा रहा हूँ, कृपया अन्यथा न लें।
Comment by Harash Mahajan on July 31, 2015 at 10:10am

आदरणीय Samar kabeer जी आपकी दस्तक से सर बहुत कुछ सीखने वाला हूँ शायद |...
मैं कुछ कंफ्युस सा हो गया हूँ ....
मां2गी2 थी1 मैं2/ने2 उम2र1 की2/ सं2जी2द1गी2/ ले2किन2
2212 2212 2212 22
सर "मगर" करने से वो (12) हो जाएगा |
सर बहर में मुझ से कहाँ गलती हो रही है |
दूसरा मिसरा भी जिसमें आपने बताया उसमें भी इसी तरह से हो रहा है....उस पर उसका अंत (1 2 ) पर बताया आपने |
इसका मतला ये हुआ...

सर बहर का मसला है ?

2212 2212 2212 12 -- ये होनी चाहिए ?
क्रपया इस पर थोड़ी रौशनी डालें तो मैं इस  दुविधा का निवारण हो सके  और इसकी बुनियाद जान सकूँ  |
इन दो तीन रचनाओं के माध्यम से आप गुनीजनों ने मुझे बहुत कुछ  दिया है .....ये कुछ जटिल समस्या लगती है |
इंतज़ार में
साभार
हर्ष महाजन

Comment by Samar kabeer on July 30, 2015 at 10:42pm
जनाब हर्ष महाजन जी,आदाब,इस वक़्त भी आपकी ग़ज़ल के दो मिसरे बह्र से भटक रहे हैं :-

(1)"मांगी थी मैंने उम्र की संजीदगी लेकिन"

:- इस मिसरे में 'लेकिन' की जगह "मगर" कर लें

(2)"मन जिसका देखूं दुश्मनी की नीव पे काबिज़"

इस मिसरे को इस तरह कर लें :-

:- "हर एक दिल प हो गई क़ाबिज़ ये दुश्मनी"
Comment by Harash Mahajan on July 30, 2015 at 11:00am

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी ...ठीक है सर अभी करता हूँ.....हाँ यही सही अर्थ स्पष्ट करेगा | आभार !!!

Comment by Harash Mahajan on July 30, 2015 at 10:59am

आदरणीय Manoj kumar Ahsaas जी आपकी पसंदगी के लिए दिल से शुक्रिया |
उम्मीद है आप होंसिला अफजाई करते रहेंगे |

साभार|

Comment by Harash Mahajan on July 30, 2015 at 10:57am

आदरणीय saalim sheikh जी आदाब ! सबसे पहले मैं आपको मेरी इस पेशकश पर हौंसिला अफजाई और इसमें आपकी ज़ह्नीय शिरकत के लिए दिल से शुक्रगुजार हूँ और आइन्दा भी अपने जज़्बात इस तरह पेश करते रहेंगे | ग़ज़ल की शिल्प के बारे में तो आप जानते हैं जिस तरह मिथलेश जी का समझना है वो दिल से अंदर तक समझ में आ जाता है और ओ बी ओ ले पाठ  वीनस जी के बहुत बेहतरीन हुए हैं | दुसरे जहाँ तक सालिम साहब कथ्य की बात है आप जानते ही हैं आप भी पुराने जानकार हैं आपकी कृतिया बताती हैं...कोई भी अहसास को समझना मुसलसल चल रही बात पर मुनस्सर होता है जो अभी तक हमने जाना है....कोई भी बात लिखने या कहने से समझी नहीं जा सकती उस अननोन अहसास को बताने का इशारा भर होता है जो उस वक़्त की बनी भूमिका पर निर्भर करता है...यहाँ इश्वर/खुदा  और उसके अपने ही अंश में वार्तालाप है ...
.' कैसे करूँ परवाज़ तेरे मंदिरों में अब '
यहाँ जिस प्रकार सोचा गया ...इस कलयुगी माहौल में दुश्मनी और मक्कारी आदि आदि सभी शब्द इसी में निहित हैं ..इस कदर निहित हो चुके हैं अब...ईश्वरीय शक्ति भी सकते में है ....कैसे परवाज़ करे | बाकी श्रोता किस हद्द तक समझ पाते हैं  ये उन पर भी निर्भर है | इसी भाव में दुसरे मिसरे को इन्हीं इशारों में कहा गया है |
मुझे उम्मीद है मैं अपनी बात रख पाया हूँ |....शुक्रिया एक बार फिर |

साभार
हर्ष महाजन


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 29, 2015 at 11:17pm

पगला गया,  नेवाज तेरे मंदिरों में अब | (अल्पविराम का स्थान बदल लीजियेगा. )

Comment by मनोज अहसास on July 29, 2015 at 8:37pm
बहुत भाव पूर्ण रचना सर
बहुत श्रेष्ठ मंच है
आपका लेखन निखरता ही जायेगा यहाँ
उपलब्ध सामग्री
ग़ज़ल की बातें
ग़ज़ल की कक्षा
पढ़ते रहिये
मै अभी सीख़ रहा हूँ
आपकी रचना मुझे बहुत भावुक कर गयी
लगे रहिये
उसके मंदिरो में पहुँच जाना ही बहुत है
हार्दिक शुभकामनाये सर
सादर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Sep 29
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी को मिलकर ओबीओ को बचाने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।"
Sep 17
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"आ.भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर रचना हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
Sep 17
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"atyant dukahd "
Sep 11
जगदानन्द झा 'मनु' replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय, प्रणाम संगहि संग हार्दिक धन्यवाद। अपनेक मार्गदर्शन पाबि बहुत बेसी मोटिवेशन आ सीखक मिलैए…"
Sep 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Aug 18
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Aug 15

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service