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नारीनामे का सफ़र

पीहर के आँगन छूटी उस मिट्टी का रंग पीला था

गाँव से संदेसा लायी उस चिट्ठी का रंग पीला था

 

जनक ने विदा किया दहेज़ का हर सामान देकर 

पीठ पर निशान किये उस पट्टी का रंग पीला था 

 

बहुत मन से बनाया साग नमक जियादा हो गया

थाली से जो फेंक मारी उस लिट्टी का रंग पीला था

 

गाँव बाहर पुल पर मजदूरी को भेजा घर वालों ने

तसले भरके जो ढोया उस गिट्टी का रंग पीला था

 

वंश बेल आगे करने को उनको इक बेटा जरूरी था

बेटी को मिला जहर दिया उस घुट्टी का रंग पीला था

 

लगन्वेदी का हर कर्त्तव्य वचन समझ निभाया था

आग में मेरा बदन जला उस भट्टी का रंग पीला था 

निधि 

मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment by मिथिलेश वामनकर on July 23, 2015 at 1:19pm

इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई आदरणीया निधि जी 

Comment by kanta roy on July 23, 2015 at 12:37pm
बेहद भावुक कर गई ये पीला रंग । पीले रंग में रंगी हुई नारी जीवन की करूण गाथा । जितने जीवन जीती है सबमें ही यहीं पीला रंग कहीं ना कही देखने में जरूर आता है । महलों से लेकर झोपड़ियों तक ये भठ्ठी सुलगती रहती है इसी पीले से रंग की ताप लिए । बहुत ही सुंदर और संवेदनशील रचना हुई है आदरणीय निधी अग्रवाल जी । बधाई
Comment by maharshi tripathi on July 22, 2015 at 10:32pm

मार्मिक  प्रस्तुति ,एक स्त्री के दुःख का अच्छा चित्रण किया है आपने आ. Nidhi Agrawal जी |

Comment by Samar kabeer on July 22, 2015 at 6:30pm
मोहतरमा निधि अग्रवाल जी ,आदाब,बहुत ही मार्मिक ग़ज़ल कही है आपने,दाद क़ुबूल करें ।
लेकिन दूसरे ,पाँचवें और छटे शैर में क़ाफ़िये ग़लत हो गए हैं,मतले में मिट्टी-चिट्ठी यानी ज़ेर वाले क़ाफ़िये हैं और दूसरे, पाँचवे और छटे शैर में ज़बर वाले क़ाफ़िये हैं जैसे पट्टी-भट्टी ,देख लीजियेगा ।
Comment by Nidhi Agrawal on July 22, 2015 at 4:55pm

आदरणीय राहुल जी.. आपका बहुत बहुत शुक्रिया .. नारीनामा हमेशा ही भावुक कर देता है 

Comment by Nidhi Agrawal on July 22, 2015 at 4:54pm

आदरणीय मनोज कुमार जी बहुत बहुत धन्यवाद. जी हाँ आप ही ने पढ़ा है .. भाव विभोर हूँ आपकी प्रतिक्रिया से 

स्नेह बनाये रखें 

Comment by Rahul Dangi Panchal on July 22, 2015 at 4:14pm
आदरणीया Nidhi जी आँखें नम हो गयी मन भावुक है। बहुत सुन्दर
Comment by मनोज अहसास on July 22, 2015 at 3:34pm
प्रणाम करता हूँ
तहे दिल से बधाई देता हूँ
इतनी मर्मस्पर्शी रचना
इतने खूब सूरत अहसास
सबसे पहले इस मंच पर शायद मैंने ही इस रचना को पढ़ा है
मै भावविभोर हूँ
भावों पर
सादर

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