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मैं तकती हूँ राह मगर क्यूँ शाम नहीं आता © परी ऍम. 'श्लोक'

२२ २२ २२ २२ २२ २२ २

उस हरजाई का कोई पैग़ाम नहीं आता
मैं तकती हूँ राह मगर क्यूँ शाम नहीं आता

करती है लाखों बातें आँखें उसकी मुझसे
जाने क्यूँ लब पे ही मेरा नाम नहीं आता

होगी कुछ सच्चाई तो कि धुआँ सा उठता है
यूँ ही तो सर पर कोई इल्ज़ाम नहीं आता

तुमसे उल्फ़त ने ही ये हाल किया है अपना
दिल की किस्मत में वरना शमशान नहीं आता

दूर खड़ा साहिल पर बेहिस तकता है मुझको
हो मुश्किल चाहे कुछ भी वो काम नहीं आता

ए इश्क़ तेरी बस्ती को कर ले गम से खाली
इन गलियो में भी दिल को आराम नहीं आता

कुछ दर्द जवां होकर तकलीफ़ बहुत देते हैं
यूँ ही तो हाथों में अपने ये जाम नहीं आता

© परी ऍम. 'श्लोक'
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Pari M Shlok on July 6, 2015 at 12:24pm
vinaya kumar singh जी बहुत बहुत आभार आपका
Comment by Pari M Shlok on July 6, 2015 at 12:23pm
मिथिलेश वामनकर जी आपका दिली शुक्रिया :)

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 6, 2015 at 2:16am

आ. परी जी 

शानदार ग़ज़ल हुई है 

दिल से दाद कुबूल फरमाएं......

एक एक शेर बेहतरीन हुआ है 

अशआर अपनी सादगी से मुग्ध कर रहे है.

मुबारकबाद और ढेर सारी दुआएं 

Comment by विनय कुमार on July 5, 2015 at 11:00pm

// होगी कुछ सच्चाई तो कि धुआँ सा उठता है
यूँ ही तो सर पर कोई इल्ज़ाम नहीं आता // , बहुत उम्दा ग़ज़ल , बधाई आपको..

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 5, 2015 at 2:59pm

करती है लाखों बातें आँखें उसकी मुझसे
जाने क्यूँ लब पे ही मेरा नाम नहीं आता    वाह वाह!

क्या कहने!बहुत सुन्दर! हार्दिक बधाई आदरणीया!

Comment by Dr. (Mrs) Niraj Sharma on July 5, 2015 at 12:39pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल, बधाई आपको।

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on July 5, 2015 at 11:47am
बहुत खूबसूरती से भावों को सजाया है मोहतरमा दिली दाद कबूल करें इस सुन्दर सी ग़ज़ल के लिए।
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on July 5, 2015 at 11:47am
बहुत खूबसूरती से भावों को सजाया है मोहतरमा दिली दाद कबूल करें इस सुन्दर सी ग़ज़ल के लिए।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 5, 2015 at 8:09am
बहुत बढ़िया परी जी दाद कुबूल फरमायें
Comment by वीनस केसरी on July 5, 2015 at 1:21am

वाह बहुत खूब

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