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ग़ज़ल - फिल बदीह -- घटी है दरमिय़ाँ दूरी , किसी के दूर जाने से ( गिरिराज भंडारी )

1222       1222       1222        1222

मुहब्बत कब छिपी है चिलमनों की ओट जाने से

नज़र की शर्म कह देगी तुम्हारा सच जमाने से 

 

अरूजी इल्म में उलझे नहीं, बस शादमाँ वो हैं

हमे फुरसत नहीं मिलती कभी मिसरे मिलाने से

 

उदासी किस क़दर दिल में बसी है क्या कहें यारों

बस अश्कों का बहा दर्या है दिल के आशियाने से 

 

अकड़ने से बढ़ा हो क़द , मिसाल ऐसी नहीं, लेकिन 

झुके हैं  बारहा  लेकिन किसी के  सर झुकाने से

 

कभी ये भी  हुआ है प्यार के रस्ते में , जादू सा

घटी है दरमिय़ाँ दूरी , किसी के दूर जाने से...

 

तो इक़रारे मुहब्बत क्या ज़बानी भी ज़रूरी है
ख़मोशी में अयां है सब, छिपा क्या है ज़माने से

**********************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 9, 2015 at 5:11am

आदरणीय सौरभ भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका आभार ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 9, 2015 at 12:31am

बहुत बढिया ! बेहतर सुझाव-सलाह भी आयी है.  हार्दिक बधाई आदरणीय गिरिराजभाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 5, 2015 at 8:19am

आदरणीय वीनस भाई , आपको गज़प पर आये देख कर ही  मै खुश हो जाता हूँ । विस्तार से प्रतिक्रिया के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ।

1/  .निश्चित ही भाव खटक रहा है ... क्या ऐसा सदैव होता है...???

  इस शे र को मैने अभिवादन ( हाथ जोड़ कर नमस्कार )  के लिये कहा है , जिसका जवाब  नमस्कार की मिलता है । फिर भी अगर इस्ताना गलत लग र्हा हो तो कुछ और सोचूँगा ,

2/  अजूबा हटा  के  अब शे र कर रहा हूँ    ----

कभी ये भी  हुआ है प्यार के रस्ते में , जादू सा

घटी है दरमिय़ाँ दूरी , किसी के दूर जाने से...

3 /  चीखे गाये  वाला शे र गज़ल से हटा रहा हूँ  , वैसे भी शेर भर्ती का मुझे खुद लगा था ।

4/  आपका सुझाया शे र बेहतरीन है , स्वीकार करने की इज़ाजत दीजिये

तो इक़रारे मुहब्बत क्या ज़बानी भी ज़रूरी है
ख़मोशी में अयां है सब, छिपा क्या है ज़माने से 

आपका आभार ,

आदरणीय वीनस भाई , मेरी एक और ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति  चाहता हूँ , ज़रूरी है . भाषायी ग़लती पर चर्चा कुछ हुआ है , हल नहीं मिला है --  वो गज़ल  ये है ---

2122     2122   2122     212

कहकहे यूँ मौत जितनी भी लगाई दोस्तो

ये न भूलो, ज़िन्दगी भी गुनगुनाई दोस्तो

Comment by वीनस केसरी on July 5, 2015 at 2:44am

मुहब्बत कब छिपी है चिलमनों की ओट जाने से

नज़र की शर्म कह देगी तुम्हारा सच जमाने से ...............बढ़िया

 

अरूजी इल्म में उलझे नहीं, बस शादमाँ वो हैं

हमे फुरसत नहीं मिलती कभी मिसरे मिलाने से..........क्या कहने

 

उदासी किस क़दर दिल में बसी है क्या कहें यारों

बस अश्कों का बहा दर्या है दिल के आशियाने से..............बहुत खूब 

 

अकड़ने से बढ़ा हो क़द , मिसाल ऐसी नहीं, लेकिन 

झुकी है भीड़ निश्चित ही किसी के सर झुकाने से...............निश्चित ही भाव खटक रहा है ... क्या ऐसा सदैव होता है...???

 

अजूबा भी हुआ है प्यार के रस्ते में , यूँ यारों

घटी है दरमिय़ाँ दूरी , किसी के दूर जाने से..........
अजूबा शब्द की महीनी को समझना आवश्यक है ...
मेरे ख्याल से चमत्कार शब्द में सकारात्मकता है वह अजूबा शब्द में नहीं है 


जो चीखे , रोये, गाये झूठ ले कर भी , वही जीते  .........

लिये सच हार बैठे , जो न छूटे  बुदबुदाने से............. यह शेर अपने ही शब्दों में बहुत उलझ गया है


जो चीखे, रोये, गाये झूठा हो कर भी वही जीते 

ये इक़रारे मुहब्बत, क्या ज़बाँ से भी ज़रूरी है

ख़मोशी जब बयाँ करती है किस्सा कब जमाने से ...........

"ये" और "कब" शब्द भर्ती का है

पहले मिसरे का एक और अर्थ देखें >> ये मुहब्बत का इकरार क्या ज़बान से भी अधिक आवश्यक है ??
ज़माने का एक अर्थ "समय" से भी लगाया जा सकता है ....
व्याकरण अनुसार और यहाँ जमाने से की जगह जमाने को शब्द आना चाहिए
बयां की जगह अयां (शुद्ध शब्द "इयां" ) शब्द अधिक उचित होगा .,... जिसका अर्थ है प्रकट करना 

शेर को कुछ यूं किया जा सकता है ....

तो इक़रारे मुहब्बत क्या ज़बानी भी ज़रूरी है
ख़मोशी में अयां है सब, छिपा क्या है ज़माने से


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 3, 2015 at 10:12am

आदरणीया कंता जी , विस्तार से गज़ल की सराहना कर उत्साह वर्धन के लिये आपका आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 3, 2015 at 10:09am

आदरणीय प्रि एम श्लोक जी , सरहना और उत्साह वर्धन के लिये आपका बहुत आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 3, 2015 at 10:08am

आदरणीय राहुल भाई , सराहना के लिये आपका अभार । 6 वें शे र मे तकाबुले रदीफ दोष है  मुझे मालूम है , याद दिलाने का शुक्रिया । मै अभी भी कुछ ठीक सा मिसरा सोच रहा हूँ ,  ता कि  सुधार कर पाऊँ । आभार आपका ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 3, 2015 at 10:05am

आदरणीय मिथिलेश भाई , हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 3, 2015 at 10:04am

आदरणीय महर्षि भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका आभारी हूँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 3, 2015 at 10:03am

आदरणीया महिमा जी , सराहना के लिये आपका बहुत बहुत आभार ।

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