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ग़ज़ल - फिल बदीह -- फिर किसी सलमान को ( गिरिराज भंडारी )

2122     2122    2122     212

***************************************

दें सहारा, लड़खड़ाते आ रहे नादान को

पूछ तो लें बोझ कितना है, भले इंसान को

 

तू समन्दर पास आँखें खोल के रखना नहीं

ठेस लग जाये न तेरे ज्ञान के अभिमान को  

 

ओ मेरे फुटपाथ पे सोये हुये मित्रों,  जगो !

क्यों बुलावा दे रहे हो फिर किसी सलमान को

 

कोशिशें तो खूब की आँसू गिरे, महफिल ने पर

हम ही बो आये वहाँ हर जा किसी मुस्कान को

 

क्यों हरा होता नहीं ये दिल , ख़िज़ाँ हो या बहार

मै कहाँ ले जाऊँ बोलो , इस दिल ए वीरान को

 

छोड़ के मज़हब सभी इंसानियत सिखला कभी 

मै   इशारा  कर  रहा हूँ  मुल्क़ के  दरबान को

 

आप कह के आप ही समझें, तो कहना क्यूँ ? तभी

आग दावत दे रही है उन सभी दीवान को

***********************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

 

Views: 756

Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 16, 2015 at 1:12pm

आदरणीया निधि जी , आपका हृदय से आभारी हूँ , गज़ल की तारीफ़ के लिये ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 16, 2015 at 1:11pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , सराहना के लिये आपका दिली शुक्रिया ।

आपकी सलाह बहुत सही है , मै परिवर्तन ज़रूर करूँगा , आपका आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 16, 2015 at 1:09pm

आदरणीय केवल भाई , उसताह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ।

Comment by Nidhi Agrawal on June 16, 2015 at 12:47pm

आदरणीय गिरिराज जी - एक अबाध बहते झरने की तरह दिल में उतर गयी ये ग़ज़ल. 

हर शेर नायाब है हर शेर का अलग सन्देश ..बहुत ही प्यारी ग़ज़ल हुई है .. सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 16, 2015 at 12:34pm

आ० अनुज

आशु शायर के रूप में भी आपका जवाब नहीं . ठेस लग जाये न तेरे ज्ञान के अभिमान को इस पंक्ति को अगर ऐसे पढ़े -------ठेस लग जाये न तेरी थाह के अभिमान को

सादर.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 16, 2015 at 10:22am

हर सुबह सविता दिखाई दे रहा है आप से,

रोज ही स्वर्णिम सफर में बांट जाते ज्ञान को.......बहुत ही प्यारि गजल हुइ है. दाद कुबूल करे. सादर...आ0 भंडारी भाई जी.

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