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अंतर्द्वंद ( लघुकथा )


" दिमाग ख़राब हो गया है इस लड़की का ", मम्मी बुरी तरह परेशान थीं । इतना अच्छा घर और वर था फिर भी मना कर दिया । अपने आप को कोस रही थीं कि क्यों सब बता दिया उसको ।
" आपको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता , इतने अस्पृह कैसे रह सकते हैं आप लोग "।
" अरे , घर में कौन काम करता है , इसमें तुम्हे क्या दिक़्क़त है "।
" माँ , जो इंसान अपने घर में एक बच्चे के काम करने पर इतना संवेदनहीन हो सकता है , वो मेरे प्रति संवेदनशील रह पायेगा "?
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on June 15, 2015 at 10:50pm

बहुत बहुत आभार आदरणीया शशि बंशल जी .

Comment by shashi bansal goyal on June 15, 2015 at 10:32pm
बहुत सशक्त रचना । सही पहचाना लड़की ने परिवार की संवेदनहीनता को । बधाई आद0 विनय जी ।
Comment by विनय कुमार on June 15, 2015 at 10:01pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय रीता गुप्ता जी , मुझे ख़ुशी है कि आप ने सराहा.

Comment by विनय कुमार on June 15, 2015 at 10:00pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सुशील सरना जी , मुझे ख़ुशी है की सन्देश पहुँच रहा है लघुकथा का .

Comment by Rita Gupta on June 15, 2015 at 6:01pm

 बच्ची समझदार हॆ, इन्सान अपने से छोटे हॅसियत वालों से कॅसा व्यवहार करता हॆ मायने रखता हॅ ।आपकी कहानी की पात्र परिपक्व हॅ, बढियां निर्णय लेती कहानी ।बहुत खूब, फिर गिनती के ही शब्दोंमें ।

Comment by Sushil Sarna on June 15, 2015 at 2:06pm

वाह बहुत खूब  … लघु कथा अपने सन्देश को पहुंचाने में सफल है। हार्दिक बधाई आदरणीय। 

Comment by विनय कुमार on June 15, 2015 at 12:47pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव साहब | आपका धन्यवाद जो आपने इतना समय दिया इस रचना पर..

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 15, 2015 at 11:29am

आ० विनय जी

बहुत ध्यान से पढ़ा तब कथा के मर्म तक पहुंचा . आजकल लडकियां भी जागरूक है और वे किसी भी ऐरे गैरेके साथ बंधने को तैयार नहीं है . बेहतरीन प्रस्तुति शब्दों के कौशल से .

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