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जीवन.....

हरी पत्तियो से ढके 
और फलों से लदे 
पंछियोंं के घने बसेरे
आस-पास वृहद सागर सा लहराता वन,
आल्हादित हैं पवन-बहारें
सॉझ-सवेरे झंकृत होते
पंछियो के कलरव स्वर
नदियों की कल-कल,
आते-जाते नट कारवॉ
उड़ते गुबार, मद्धिम होती रोशनी, आँख मींचते बच्चे
तम्बू में घुस कर खोजते, दो वक्त की रोटी...
पेट की आग का धुआँं, करता गुबार
रूॅधी सांसों के कुहराम
आधी रोटी के लिए करते द्वन्द
तलवारें चमक जाती, बिजली सी
धरा पर मासूम चटाईयों के बिछते ही
चूल्हा बुझ जाता
सो जाती हैं आखें
अपलक सुनहरे स्वप्न में.....
स्वर्ण हिरण की अव्यक्त व्यथा
ज्येष्ठ माह की अग्नि में झुलसता गोश्त
मॅुह तक आ कर फिर गायब हो जाता
नन्दन वन सा आनन्द.....
गूंगों के मुख का बतासा ....नींद खुलते ही...
सुस्वाद की घनी छॉंव
पथ में बिखर कर भी सहेजती

जीवन ....।

के0पी0सत्यम/ मौलिक व अप्रकाशित

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 28, 2015 at 12:53pm

बहुत ही मार्मिक रूप से अभिव्यक्त हुई है यह कविता, बड़े बड़े शहरों के लाल बत्ती, सड़क किनारे यह कविता दीख जाती है, एक संवेदनशील विषय को स्थान देने हेतु हृदय से आभार आदरणीय केवल भाई.

Comment by Shyam Narain Verma on May 28, 2015 at 11:50am
इस सुंदर प्रस्तुति के लिए तहे दिल बधाई सादर
Comment by Samar kabeer on May 28, 2015 at 10:44am
जनाब केवल प्रसाद जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 28, 2015 at 8:34am

मार्मिक एवं भावपूर्ण रचना के लिये बधाई ....

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