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मुक्ति (लघुकथा)/रवि प्रभाकर

‘आज तो लाला ने भी और मोहलत देने से साफ मना कर दिया । समझ नहीं आ रहा अब क्या होगा? बैंक की किश्तें, अगले महीने छोटी की शादी... इस बेमौसमी बरसात ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा ।’ साहूकार की दुकान से बाहर निकलते हुए परेशानी के आलम में वो अपने साथी से बोला
‘सब्र से काम लो भाई ! अब जो भगवान को मंजूर ... अरे ! उधर क्या करने जा रहे हो ... उस तरफ तो बाजार है ?’
‘एक रस्सी लेने...।’

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 5, 2016 at 6:02pm

गरीबों की अपनी ही व्यथा होती है | बहुत बहुत बधाई आदरणीय सर इस बेहतरीन कथा के लिए |

Comment by kanta roy on February 4, 2016 at 11:37pm

हाँ , गरीब चाहे कितना  भी गरीब हो जाए ,रस्सी खरीदने के पैसे उसके पास जरूर होते है क्यूंकि हारे हुए वक़्त में सिर्फ  ईमानदारी से साथ देता है।  बहुत -बहुत बधाई आपको आदरणीय रवि जी इन सुपरहिट्स के लिए ।  

Comment by Ravi Prabhakar on May 26, 2015 at 3:01pm

रचना को अपना अमूल्‍य समय देने हेतु आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद आदरणीय सत्‍यनारायण पाण्‍डेय जी ।

Comment by Ravi Prabhakar on May 26, 2015 at 3:00pm

श्रद्धेय सौरभ भाई जी आपकी उपस्‍िथती से अनुग्रहीत हूं। मार्गदर्शन करते रहें और स्‍नेह बनाएं रखें । आभार


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 25, 2015 at 7:08pm

आज के समय की ज़मीनी सच्चाई को बखूबी उभारा है आपने रवि भाईजी..

प्रस्तुत पर भले ही विलम्ब से टिप्पणी कर रहा हूँ, लेकिन इसे पढ़ गया था. हार्दिक बधाइयाँ.

Comment by Satyanarayan Singh on May 17, 2015 at 10:47am

समसामयिक सुंदर लघुकथा हेतु हार्दिक बधाई आ. रवि प्रभाकर जी 

Comment by Satyanarayan Singh on May 17, 2015 at 10:47am

समसामयिक सुंदर लघुकथा हेतु हार्दिक बधाई आ. रवि प्रभाकर जी 

Comment by Ravi Prabhakar on May 17, 2015 at 8:08am

रचना पर आपके सान्‍िनध्‍य व अनुमोदन से आपका कृतज्ञ हूं आदरणीय शुभ्रांशु भाई जी ।

Comment by Ravi Prabhakar on May 17, 2015 at 8:07am

धन्‍यवाद आदरणीय सविता मिश्रा जी ।

Comment by Shubhranshu Pandey on May 15, 2015 at 9:21am

आदरणीय रवि जी, 
सुन्दर कथा,

रस्सी ने किसानों की सारी हकीकत सामने रख दी है. रस्सी से अनाज का बोझा बांधते बांधते आज गले का फ़ंदा बांधने लगे हैं.

सादर.

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