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एक सर्प ने समझ मूषिका  

ज्यों पकड़ा एक छछुंदर को

उसी समय एक मोर झपट

कर दिया चोंच उस विषधर को |

 

फिर मोर भी हुआ धराशायी

घायल जो किया व्याध-शर ने

पर व्याध निकट जैसे पहुँचा

डस लिया व्याध को फणधर ने |

 

शेष रही बस छद्म-सुन्दरी

सृष्टि-रूप धर जीवन-थल पर

और सभी अंधे हो-होकर

नियति-भक्ष बन गए परस्पर |

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

-- संतलाल करुण   

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Comment

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Comment by Santlal Karun on May 5, 2015 at 5:38pm

आदरणीय जितेन्द्र जी,

श्लाघात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 4, 2015 at 10:36am

बहुत सुंदर, आदरणीय संतलाल जी. बधाई स्वीकारे

Comment by Santlal Karun on May 3, 2015 at 1:55pm

आदरणीया सीमा अग्रवाल जी, लघुकथा की प्रशंसा के लिए सहृदय आभार !

Comment by Santlal Karun on May 3, 2015 at 1:53pm

आदरणीय लड़ीवाला जी, लघुकथा की सराहना के लिए हार्दिक आभार !

Comment by Santlal Karun on May 3, 2015 at 1:51pm

आदरणीय महिमा श्री जी, लघु कथा पर प्रेरक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

Comment by Santlal Karun on May 3, 2015 at 1:01pm

आदरणीय डॉ. विजय शंकर जी,

लघु कथा पर प्रशंसात्मक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

Comment by seema agrawal on May 3, 2015 at 10:37am

शेष रही बस छद्म-सुन्दरी

सृष्टि-रूप धर जीवन-थल पर

और सभी अंधे हो-होकर

नियति-भक्ष बन गए परस्पर 

बहुत  सुन्दर .............. स्वयम  के सर्वश्रेष्ठ  होने  का  भ्रम और  छद्म के  व्याख्या  लाजवाब हुयी  है ............

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 2, 2015 at 11:08am

बहुत सुंदर 

Comment by MAHIMA SHREE on May 1, 2015 at 7:39pm

वाह.. बहुत सुंदर ..बचपन में पढ़ी पंचतंत्र की वो कहानी याद आ गई बधाई

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 1, 2015 at 7:32pm
वाह , बहुत ही सुन्दर! सारगर्भित , आदरणीय संतलाल करून जी, बधाई, सादर .

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