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क्योंकि वह एक लड़की है (कविता )

ख्वाहिशों के सूरज का उगना हर सुबह 
मन की खिड़की से झांकना हर सुबह 
परदे मन पर लगाना चाहती है 
ओट में हसरतों को दबाना चाहती है 
क्योंकि वह एक लड़की है 
समाज की नज़रों में लड़की बोझ होती है 
उसे उम्मीदों के आँगन में 
आशाओं के फूल खिलाने का 
कोई हक नहीं होता 
उसे हक है बस इतना कि 
पराया धन कहलाए 
किसी और के मधुबन को
चमन वो बनाए 
लगा कर माथे रक्तिम गोल चिन्ह 
किसी की पत्नी तो 
किसी की बहू वह कहलाए 
पैरों में बाँध कर बन्धनों की पायल 
अपनी ही आवाज़ को
घुंघुरू के शोर में दबाए 
मौनमूक रह अपने कर्तव्यों को निभाए 
ड्योढ़ी पर आते आते कदम उसके थम से जाते हैं 

क्योंकि वह एक लड़की है !!

(मौलिक और अप्रकाशित )

डिम्पल गौड़ " अनन्या "

Views: 851

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 22, 2015 at 9:39am

आधी दुनिया का दर्द लिए सार्थक रचना पर बधाई आदरणीया डिम्पल गौड़ " अनन्या " जी

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 22, 2015 at 7:08am

आदरणीया अनन्या जी ...वाह क्या सुन्दरता से आपने इतनी गहरी बात कह दी...बहुत बहुत बधाई .... 

Comment by shree suneel on April 22, 2015 at 12:33am
आदरणीया अनन्या जी, स्त्री - वेदना को रेखांकित करती इस रचना के लिए बधाई. सार्थक प्रस्तुति.
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 21, 2015 at 7:11pm

//ड्योढ़ी पर आते आते कदम उसके थम से जाते हैं 

क्योंकि वह एक लड़की है //  मार्मिक रचना हुई है.  आ0  डिम्पल गौर जी,  बधाई.

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 21, 2015 at 1:08pm
नारी होने के साथ जुड़े बंधनों , प्रतिबन्धनोंं एवं विवशताओं का चित्रण करती हुई सुन्दर रचना आदरणीय सुश्री डिम्पल गौर जी, बधाई, सादर।
Comment by Samar kabeer on April 21, 2015 at 10:52am
मोहतरमा 'अनन्या' जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें |

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