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“अरे!! भाई.. दोनों में से एक बैल तो अभी दांत वाला है, ठीक से कीमत बता. फिर बिना दांत वाला वैसे ही लेजा, उसका क्या करूँगा मैं..? आखिर खली-भूसा भी महंगा पड़ता है..”

“पटेल भैया .. दांत वाले की ही कीमत है, बुढ्ढे बैल को मुझ से भी कौन खरीदेगा..? यहीं खूंटे भी ही मरने दो..”

नजदीक ही पटेल भैया के बीमार पिता, चारपाई पर पड़े सारी बातें सुन रहे थे...

 

  जितेन्द्र पस्टारिया

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment by rajesh kumari on March 24, 2015 at 8:10am

बहुत मार्मिक ...आपकी लघु कथाएँ इशारों इशारों में बहुत गंभीर बात कह देती हैं यही ख़ासियत है बहुत बहुत बधाई जितेन्द्र भैया 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 23, 2015 at 11:06pm

आदरणीय जीतेन्द्र जी लगता है आप मेरी बात समझ नही पाये!! मेरा कहना ये है कि बैल चाहे कितना भी बूढ़ा क्यों न हो जाये,आमतौर पर इस तरह के पशुओ के दांत वृद्धावस्था में नही गिरते!!इस दृष्टी से आप दांत न होना को बैल के वृद्ध होने से जोड़कर नही दिखा सकते!!

यहाँ बैल की बूढी काया,अस्थिपिंजर दिखना आदि को प्रतीक के तौर पे लिया होता तो तथ्यगत होता!!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 23, 2015 at 10:42pm

रचना पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया हेतु आपका आभारी हूँ, आदरणीय डा.गोपाल जी.

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 23, 2015 at 10:41pm

सराहना व् उपश्थिति हेतु आपका ह्रदय से आभार, आदरणीय श्याम नारायण जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 23, 2015 at 10:40pm

आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु आपका आभारी हूँ, आदरणीय कृष्णा जी. आप सही कह रहे है की बैल के दांत बुढापे में नहीं होते किन्तु जब बैल ,शिशु अवशथा में होता है तो उसे बछड़ा कहा जाता है.

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 23, 2015 at 10:35pm

आपका आत्मीय आभार ,पवन भाई

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 23, 2015 at 10:34pm

रचना को आपका आशीर्वाद मिला, रचना धन्य हुई आदरणीय डा.विजय जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 23, 2015 at 10:32pm

आपकी बधाई सहर्ष स्वीकार है आदरणीय मिथिलेश जी. सराहना हेतु आपका ह्रदय से आभार

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 23, 2015 at 10:31pm

आपका बहुत-बहुत आभारी हूँ, आदरणीय विनय जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 23, 2015 at 10:30pm

लघुकथा की सराहना व् उत्साहवर्धन हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ ,आदरणीय हरिप्रकाश जी

सादर!

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