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ग़ज़ल :- तन्हाई में अक्सर सोचा करते हैं

बह्र:-फ़ैलुन फ़ैलुन फ़ैलुन फ़ैलुन फ़ैलुन फ़ै

तन्हाई में अक्सर सोचा करते हैं
हम को क्या करना था और क्या करते हैं

हम शाईर हैं,हम से क्या पोशीदा है
दुनिया को हर रंग में देखा करते हैं

उनसे बढ़कर झूट न कोई बोलेगा
जो भी सच कहने का दावा करते हैं

ऐसे भी नादान हैं जो घर का रोना
बाज़ारों में बैठ के रोया करते हैं

उनकी आदत है सैराब नहीं करते
क़तरा क़तरा प्यास बुझाया करते हैं

दुनिया वाले चैन से सोते हैं और हम
ज़ख़्मों की गहराई नापा करते हैं

दुनिया भर की लानत है उन लोगों पर
जो अपने ईमान का सौदा करते हैं

अपना तो ईमान यही है यार "समर"
जो भी वह करते हैं अच्छा करते हैं


"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

Views: 880

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Comment by Samar kabeer on March 24, 2015 at 10:01pm
जनाब विजय निकोरे जी आदाब,हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रिया |
Comment by vijay nikore on March 24, 2015 at 11:04am

अच्छी गज़ल के लिए बधाई।

Comment by Samar kabeer on March 23, 2015 at 10:24pm
जनाब "जान" गोरखपुरी साहिब ,आदाब, हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Samar kabeer on March 23, 2015 at 9:43pm
आली जनाब डा.विजय शंकर जी,आदाब,हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 23, 2015 at 8:33pm
उनसे बढ़कर झूट न कोई बोलेगा
जो भी सच कहने का दावा करते हैं

ऐसे भी नादान हैं जो घर का रोना
बाज़ारों में बैठ के रोया करते हैं

लाजव़ाब! क्या कहने! ये दो शेर बहुत ही पसंद आये! सुन्दर गजल पर ढेरों दाद कबूल फरमाएं आदरणीय समर कबीर सरजी!
Comment by Samar kabeer on March 23, 2015 at 6:17pm
जनाब श्याम नारायण वर्मा जी,आदाब,ज़र्रा नवाज़ी के लिये तहे दिल से शुक्रिया |
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 23, 2015 at 6:17pm
बहुत सुन्दर , आदरणीय समर कबीर जी, बधाई , सादर।
Comment by Samar kabeer on March 23, 2015 at 6:13pm
जनाब नरेन्द्र जी,आदाब ज़र्रा नवाज़ी के लिये तहे दिल से शुक्रिया |
Comment by Samar kabeer on March 23, 2015 at 6:11pm
जनाब धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी,आदाब,ज़र्रा नवाज़ी के लिये तहे दिल से शुक्रिया |
Comment by Samar kabeer on March 23, 2015 at 6:08pm
जनाब हरी प्रकाश दुबे जी आदाब,हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |

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