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कविता :- सच कहना तुम भूली मुझको ?

कविता :- सच कहना तुम भूली मुझको ?

काल चक्र के इस प्रवाह में

सुख दुःख और इस धूप छाँह में

सच कहना तुम भूली मुझको ?

 

कभी तो तुम भी रोती होगी

नियति न्याय को ढोती होगी

हूक सी उठती होगी दिल में

मन ही मन कुछ खोती होगी

सच कहना कैसा लगता है ?

 

समझौतों के साथ में  जीना

जीना पल पल छुप छुप सीना

जीवन की ऐसी ही परिणति

किसने सोचा ऐसा होगा

खामोशी के जैसा होगा

कोई आस जो प्यास अधूरी

जाने कब होगी ये पूरी ?

 

या बन जायेगा अफसाना

जग झूठा झूठा ये बाना

हमें निभाना ! तुम्हे निभाना !!

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on April 11, 2011 at 3:31pm
aapki tippani sar aankhon par saurabh jee thanks a lot .

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 10, 2011 at 1:48pm

मैं बहुत देर तक डूबा रहा प्रथम तीन पंक्तियों में अरुणजी.  मेरी टिप्पणी को कृपया सकारात्मक आयाम के साथ स्वीकारें.

भाईजी,  बंद आँखों से लगातार.. देर तक.. व्योमवर्त्त की सीवान पर चहलकदमियाँ करता रहा..  गये-रहे कितने क्षणों को सहेजता रहा.  .. जाने कितने रोचक-विरोचक बिम्ब उभरे, विलुप्त हुये.    

यह अवश्य है कि, रचनाएँ अपने होने और उमगने के क्रम में उक्त रचयिता की भावनाएँ संप्रेषित करती हैं. एक बार नियत हो जाने के बाद रचनाएँ पाठकों की भावनाओं का पर्याय न बन जायँ तो उनका होना सफल नहीं माना जा सकता. फिर तो पंक्तियाँ एक अलहदा संज्ञा जीने लगती हैं.  रचनाकार की भावनाओं से एकदम अलग उनसे कुछ और संप्रेषित होने लगता है .. एकदम अलग पार्श्व को रंगते हुये.

इस मानक पर आपकी पंक्तियाँ मेरे मर्म को न केवल झंकृत किया है बल्कि मेरे अंतर को मानो स्वर देती लग रही हैं.. इन प्रथम तीन पंक्तियों को मेरा सादर प्रणाम. 

//काल चक्र के इस प्रवाह में

सुख दुःख और इस धूप छाँह में

सच कहना तुम भूली मुझको ? //

 

Comment by Abhinav Arun on April 8, 2011 at 10:41pm
आदरणीय श्री सौरभ जी मैं आपका आशय नही समझ पाया ?? फिर भी स्वीकार है की मैं स्वतः इस प्रकार की कविताओं के लिये जाना जाऊँ यह चाहत नही , मूलतः मैं अपनी राष्ट्रवादी सामाजिक ग़ज़लों को ही अपनी मिजाज़ की रचना मानता हूँ | टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार |

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 6, 2011 at 3:24pm

माफ़ कीजियेगा.. प्रारंभ की तीन पंक्तियों के बाद आगे बढ़ ही नहीं पाया.  और, मुझे इसका बिल्कुल अफ़सोस नहीं है.

नरम पंक्तियों के लिये हार्दिक बधाई.

Comment by Abhinav Arun on April 6, 2011 at 2:41pm
thanks rajeev jee for appreciation.
Comment by Rajeev Mishra on April 5, 2011 at 9:26pm
waah arun bhai bahut hi sunder bhav pooran rachna ( kaal chakra ka prabhav ) bahut khoob !
Comment by Abhinav Arun on April 3, 2011 at 1:51pm

आभारी हूँ धीरज जी आपके शब्द मुझे और बल देंगे !!

Comment by Dheeraj on March 28, 2011 at 11:53am
बहुत ही अच्छी रचना है अरुण जी, बिल्कुल हृदय मे छप जाने लायक ......... एक पल को तो आँखे भर आई ..... भगवान करे ऐसी सुंदर रचनाए आपके लेखनी से छलकते रहे और सब आपकी रचनाओ की भावनाओ से भावविभोर होते रहे.
Comment by Abhinav Arun on March 25, 2011 at 2:10pm
thanks aashish jee |
Comment by आशीष यादव on March 25, 2011 at 1:28am
ek sundar rachna ke liye badhai arun sir.

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