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धुंध का परदा हटाओ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122    2122    2122    212
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झील के पानी  को  फिर से बादलों ताजा करो
नीर हो  झरते  रहो तुम मत कभी ठहरा करो
***
सिर्फ गर्जन  के लिए  कब  धूप जनती है तुम्हें
प्यास  खेतों  की  बुझाओ  खेल  से  तौबा करो
***
जान का भय  किसलिए है परहितों की बात जब
धुंध  का  परदा   हटाओ   दूर   तक   देखा   करो
***
सूर्य  के  तुम  वंशजों  में  छोड़   दो  मायूसियाँ
त्याग दो  जीवन भले ही तम को मत पूजा करो
***
यूँ अँधेरों की  तिजारत  करके हासिल क्या हुआ
होश  में   आओ  जरा   अब   रौशनी  बाँटा करो
**
मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 25, 2015 at 11:00am

आ0 भाई हरिप्रकाश जी , गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 25, 2015 at 11:00am

आ0 भाई विजय शंकर जी गजल का अनुमोदन करने के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by Hari Prakash Dubey on February 25, 2015 at 9:43am

आदरणीय लक्षमण धामी जी सुन्दर ग़ज़ल है बधाई आपको !

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 25, 2015 at 7:01am
यूँ अँधेरों की तिजारत करके हासिल क्या हुआ
होश में आओ जरा अब रौशनी बाँटा करो
सुन्दर ग़ज़ल, आदरणीय लक्षमण धामी जी, बधाई , सादर।

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