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रिश्तें है बेतार..... (मिथिलेश वामनकर)

22  / 22  / 22  / 22 / 22  /  2

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बादल  जब  बेज़ार  किसी  से  क्या कहना

फिर  कैसी  बौछार किसी  से  क्या कहना

 

ख़ामोशी,  सन्नाटें   किस   की   सुनते  है

बातें  है   बेकार  किसी  से   क्या  कहना

 

बूढ़े  पेड़ों  पर   आखिर   क्या   गुजरी   है

पढ़ लो बस अखबार किसी से क्या कहना

 

रोते   है   वाइज़,    रोने   दो   रस्मों   को

कर लो बस यलगार किसी से क्या  कहना

 

अपनी  छतरी  लेकर    निकलों  राहों   में

बारिश  के आसार  किसी  से क्या  कहना

 

जैसे  तैसे  हम   तो  खुद   को  ढो    लेंगे

काँधें  जो  नाज़ार  किसी से  क्या  कहना

 

दूरी  में     अब   कुर्बत   कैसे      आएगी

रिश्तें  है  बेतार   किसी  से   क्या  कहना

 

आदत   अपनी   जाते - जाते      जाएगी

वो भी है  लाचार किसी से  क्या    कहना

 

महफ़िल  में तनहां  थे  पर  खामोश  रहे  

कब थे हम दरकार किसी से क्या  कहना

 

साहिल से ‘मिथिलेश’ न देखों  लहरों  को

जीवन है मझधार  किसी  से क्या कहना

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 24, 2015 at 6:05pm
आदरणीय दिनेश भाई जी बहुत बहुत आभार धन्यवाद।
Comment by दिनेश कुमार on February 24, 2015 at 4:40pm
भाई मिथिलेश जी, बेहतरीन ग़ज़ल हुई है। मकता अद्वितीय है। वाह वाह

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 20, 2015 at 7:45pm

आदरणीया प्रतिभा जी, रचना पर स्नेह, सराहना और सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार, हार्दिक धन्यवाद 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 19, 2015 at 11:38pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, प्रयास के अनुमोदन हेतु हार्दिक आभार.

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 19, 2015 at 11:11pm
सब अपनी अपनी ही कहते हैं,
बेकार , किसी से क्या कहना ॥
बहुत अच्छी प्रस्तुति , प्रिय मिथिलेश जी, बधाई, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 19, 2015 at 9:27pm

आदरणीय गिरिराज सर, ग़ज़ल आपको पसंद आई, शेर कोट करने योग्य हुआ, लिखना सार्थक हुआ..  स्नेह, सराहना और सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार, हार्दिक धन्यवाद 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 19, 2015 at 8:54pm

बूढ़े  पेड़ों  पर   आखिर   क्या   गुजरी   है

पढ़ लो बस अखबार किसी से क्या कहना  -- बहुत खूब , आदरणीय मिथिलेश भाई , बढ़िया गज़ल हुई है , इस शे र का तो कहना ही क्या । दिल से बधाइयाँ स्वीकार करें ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 19, 2015 at 8:28pm

आदरणीय maharshi tripathi जी, रचना पर स्नेह, सराहना और सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार, हार्दिक धन्यवाद 

Comment by maharshi tripathi on February 19, 2015 at 8:22pm

आपकी प्रस्तुति दिल तक पहुचती है आ. मिथिलेश जी ,,,आपको बहुत बहुत बधाई ,इस रचना हेतु |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 19, 2015 at 7:13pm

आदरणीया परी जी ग़ज़ल के अंदाज़े-बयां पर दाद के लिए तहे-दिल से शुक्रिया.

कृपया ध्यान दे...

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