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वो जैसे नचा रहा है, मैं वैसे नाच रहा हूँ

समय

साक्षी है

अतीत का

वर्तमान का

मैं सिर्फ इसके

साक्ष्य को

दोहरा रहा हूँ

इसके लिखे गीतों को

गुनगुना रहा हूँ !

 

समय

ने बाँध दिया

जीवन और

मृत्यु की

डोर से मुझको

और मैं

पतंग की तरह

हवाओं में,

लहरा रहा हूँ !

 

धागा

ये प्रेम का

बड़ा नाजुक है

टूट ना जाये कहीं

ये सोच के 

घबरा रहा हूँ 

वो जैसे नचा रहा है

मैं वैसे नाच रहा हूँ !!

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित

Views: 909

Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on February 7, 2015 at 11:54pm

 आदरणीय जितेन्द्र पस्टारिया साहब बहुत बहुत धन्यवाद आपका ! सादर

 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 7, 2015 at 11:48pm

आदरणीय गिरिराज सर,आपकी उत्साहवर्धक और प्रेरणादायी टिप्पणी के लिए हृदय से धन्यवाद आभार।

Comment by Hari Prakash Dubey on February 7, 2015 at 11:46pm

आदरणीया सविता मिश्र जी , आपकी उत्साहवर्धक  टिप्पणी के लिए हृदय से धन्यवाद । सादर

Comment by Hari Prakash Dubey on February 7, 2015 at 11:45pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , आपका बहुत बहुत आभार , आपके मार्गदर्शन से एक पंक्ति बढ़ा  दी है , धन्यवाद आपका ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 5, 2015 at 5:32pm

आदरणीय Anurag Goel जी आपका बहुत - बहुत धन्यवाद

Comment by Hari Prakash Dubey on February 5, 2015 at 5:25pm

आदरणीय विश्वराज भाई,बहुत -बहुत धन्यवाद आपका !

Comment by Hari Prakash Dubey on February 5, 2015 at 5:10pm

आदरणीय Er. Ganesh Jee "Bagi  सर आपकी उत्साहवर्धक और प्रेरणादायी टिप्पणी के लिए हृदय से धन्यवाद आभार। सादर

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 4, 2015 at 4:12pm

बहुत सुंदर, आदरणीय हरिप्रकाश जी. सब कुछ समय ही है. बधाई स्वीकारें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 4, 2015 at 1:30pm

आदरणीय हरि भाई , सभी का यही हाल है , समय नचाता है , हम नाचते हैं । सुन्दर रचना लगी ! बधाइयाँ ।

Comment by savitamishra on February 4, 2015 at 10:14am

बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ

कृपया ध्यान दे...

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